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आभूषण महाराष्ट्र के

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देशी विदेशी सभी महिलाओं को गहनों से विशेष लगाव होता है।भारत में हर प्रदेश की महिलाओं के कुछ विशिष्ट आभूषण होते है।उत्तर भारत में मांगटीका का प्रचलन है तो दक्षिण भारत में बालों की चोटी या जूडे में सजाये जाने वाले फूल लोकप्रिय है। महाराष्ट्रियन महिलाओं के मंगलसूत्र और नथ तो अब सभी भारतीय महिलाओं में प्रसिद्धी पा चुका है और बहुत लोकप्रिय भी है। मगर कुछ महाराष्ट्रियन आभूषणों के बारे में अन्य भारतीयों को जानकारी नही होगी जैसे कि 1 कोल्हापुरी साज : कोल्हापुर जो कि अंबाबाई मंदिर और चप्पल के लिए प्रसिद्ध है उसी कोल्हापुर के नाम का गले में पहना जाने वाला यह आभूषण 'कोल्हापुरी साज' जिसे महाराष्ट्र में मंगलसूत्र के बराबर महत्व है। परंपरागत रूप से इसमें इक्कीस पत्ते होते है जिन्हे मराठी में पानाडी कहते है। बीच वाला पत्ता थोडा बडा लॉकेट जैसा जिसे साजघाट कहते है। उसपर किर्तिमुख बना हुआ होता है जो रक्षण करता है। साजघाट के मध्य स्थान पर लाल नग लगा होता है। अन्य बीस पत्तों पर तुलसी, कमल, ऐरावत, वाघनख, कामधेनु, तोता, शंख, चक्र, मोरपंख, मत्स्य, चंद्र, सूर्य, नागदेवता, बेलपत्र आदि शुभ चिन्ह बने होत...

काॅम्प्लिमेंटस्

कुछ वर्ष पहले एक all women group के साथ दुबई प्रवास किया था। सभी महिलायें विभिन्न आयु गट की थी। सब अपने अपने ग्रुप के साथ थी। कुछ अकेली भी थी। इनमें एक सदस्या ऐसी थी जो हर ग्रुप के साथ enjoy कर रही थी। हालांकि वह उम्र में सबसे बडी थी मगर सबसे छोटी सदस्या के साथ भी उनकी दोस्ती थी। इसका कारण शायद यह था कि उन्हे हर एक में कोई न कोई गुण नजर आता था। वे हर किसी को कुछ न कुछ compliment जरूर देती थी। किसी के ड्रेस पर तो किसी के बालों पर तो किसी के स्माईल पर। मुझ से भी उन्होंने कहा, "अरे, कितना फास्ट चलते हो आप। कितनी एनर्जी है आपमें।" बस हो गई दोस्ती। Compliment किसे पसंद नही आता? अब इसतरह सबकी तारीफ करने के पिछे उनका कोई स्वार्थ तो होगा नही क्यों कि enjoy करने के लिए उनका अपना ग्रुप था और सब जानते थे कि छह दिन बाद हर एक को अपने रास्ते निकलना है। शायद उनकी नज़र हि इतनी साफ थी कि केवल अच्छाई को हि  परखती थी और दिल इतना बड़ा कि अच्छाई की तारीफ करने से अपने आप रोक नही पाती थी और बस माहौल खुशनुमा और दोस्ती भरा हो जाता था। मार्क ट्वेन का कथन है, 'I can live for two months on a good co...

श्रेष्ठ दार्शनिक कबीर

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                                        जेष्ठ मास की पूर्णिमा संत कबीर दास की जयंती के रूप में मनाई जाती है जो इस वर्ष 2026 में 29 जून को मनाई गई। मेरे वाचन व्यासंग के प्रवास में कबीर दास जी के बारे में जो कुछ मैंने जाना और समझा उसका संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण।  पंद्रहवी सदी के इस महान भारतीय दार्शनिक का स्थान हिंदी भक्ति धारा के कवियों में बहुत उँचा है। कबीर दासजी की भाषा राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खडी बोली, अवधी और ब्रजवासी के शब्दों की पंचमेल खिचड़ी है। इन सभी भाषाओं के शब्द प्रयोग करते हुए उन्होंने अपनी भाषा को सरल और सुबोध बनाया ताकि आम आदमी समझ सके। 'पोथी पढि पढि जग मुवा, पंडित भया न कोय।                             ढाई आखर प्रेम का, पढे सो पंडित होय।'                               इन शब्दों में प्रेम की महिमा बताने वाले कबीर ज...

ज्ञानगंगा

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                                          आज एक स्मार्ट फोन हाथ में है तो यह प्रश्न तो बचा नही कि समय कैसे काटे लेकिन अब 'क्या करें कि ना करें कैसी मुश्किल हाय' यह परीस्थिति उत्पन्न हो गई है। इसका कारण है उस स्मार्ट फोन के जरिए हम तक पहुँचने वाली अविरल ज्ञानगंगा। हर छोटी छोटी बात पर तरह-तरह का ज्ञान उपलब्ध है, जो हम सब रोज पढते हैं और समझ आता है उसमें बहुत हि विरोधाभास है। और सब बातों को छोड़िये मगर जो बातें हमें सीधे सीधे प्रभावित करती है जैसे खानपान, सेहत, व्यायाम आदि के बारे क्या जानकारी उपलब्ध है और उसमें कितना और क्या क्या विरोधाभास है यह देखते है। एक कहता है हर दो दो घंटे में खाना खाओ चाहे थोडा थोडा खाओ। दूसरा कहता है जब भूख लगे तब खाओ तो तिसरे का विचार है दिन में केवल दो हि बार खाओ चाहे हर बार 45 मिनट तक खाते रहो। सोचो जरा 45 मिनट में कितना खाना जा सकता है पेट में। अब हम बच्चे तो रहे नही कि 45 मिनट तक एक रोटि भी खत्म न हो और माँ डाँटती रह जाए,"खा न जल्दी।" कोई सलाह देगा दिनभर ...

मै वापस आऊंगा

सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखना तो मैंने कब का छोड हि दिया है।एक जमाने में हर तरह की जद्दोजहद करके हर फिल्म देखने की मेरी पूरी कोशिश रहती थी। आज दस साल से अधिक हो गए घर के एकदम पास हि माॅल और थियेटर बने हुए मगर अबतक दो हि फिल्मे देखी है। अब इसमें मेरी उम्र का कसूर है कि आजकल की फिल्मों का पता नही। या फिर OTT platforms का योगदान रहा होगा। स्मार्ट बाज़ार से निकलते समय पोस्टर पर नसीरूद्दीन शाह और दिलजीत दोसांज के चेहरे देखे और इम्तियाज अली का नाम पढा तो उत्सुकता जागी। 'मैं वापस आऊंगा' नाम से तो love story लग रही थी। मिडिया में फिल्म की कोई चर्चा भी नही थी तो मन में अच्छी या बुरी ऐसी कोई धारणा भी नही थी। लगा कि शायद भीड भी न हो। तो एक accidental movie watching का कार्यक्रम बन गया। आशा के विपरित अच्छी खासी भीड थी। फिल्मों के प्रचलित सांचे की तरह इस  फिल्म में नायक या खलनायक कोई नही। फिल्म का कथानक जो देश के विभाजन से जुडा है, वही है सबकुछ। फिल्म को प्रेम कहानी कह सकते है जो अपने अस्तित्व से प्रेम की बात कहती है। फिल्म में संगीत ए. आर. रहमान ने दिया है जो शांत, सुकून भरा और सुमधुर है। ...

स्पर्श का जादू

आजकल एक चाय का विज्ञापन चल रहा है जिसमें एक नेत्रहीन व्यक्ती कहता है, "हमें सुगंध से पता चलता  है कि अच्छी है या नही।" वाकई उन्हे प्रकृति द्वारा यह देण मिली है। साथ हि स्पर्श के बारे में भी वे काफी संवेदनशील होते है। वैसे स्पर्श का करिश्मा तो हम सभी हर घडी अनुभव करते है। स्कूल में ज्ञानेंद्रियों के बारे में पढते हुए बस यही जाना कि स्पर्श में न शब्दों की आवश्यकता है ना भाषा की। नवजात शिशु माँ की गोद में आते हि रोना बंद करता है क्यों कि वह उस स्पर्श को तब से पहचानता है जब से माँ के गर्भ में स्थित था। उस नवजात का स्पर्श भी कितना मुलायम, एकदम मक्खन सा। और माँ का स्पर्श? ममता से भरा हुआ, संवेदनशील। वही पिता का स्पर्श आश्वासक, दुनिया जितने की प्रेरणा देने वाला। दादा दादी, नाना नानी के दुलार भरे स्पर्श सारी गलतियाँ नजरअंदाज कर के हौसला बढानेवाले।  जीवन का सबसे प्यारा रिश्ता मैत्री का। मित्र का स्पर्श आनंद और उत्साह देनेवाला। कितनी ही लडाईयां हो एक प्यार वाली झप्पी सारे गिले शिकवे दूर कर देगी। कितना हि संकट भरा समय हो कंधे पर मित्र का स्पर्श और 'all is well ' के शब्द।  आप संक...

यु.ए.ई. प्रवास

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                                               अपने बेटे और पति को बाय कहते हुए मैंने मुंबई एयरपोर्ट के भीतर प्रवेश किया और दिल की धड़कन तेज़ हुई। अपने परिवार के साथ सुरक्षितता से ढेर सारा भ्रमण कर लेने के बाद आज मै वीणा वर्ल्ड के लेडिज स्पेशल टूर पर अकेले निकली थी। चेक इन के पास हमारे टूर मॅनेजर अक्षय वैद्य मिले। डिनर की व्यवस्था एयरपोर्ट पर हि थी जहाँ भावना मिली। वो भी अकेली थी। साथ डिनर कीया। दिल की धड़कन अब काबू में थी। फ़्लाईट में आशा एन सी साथ बैठी थी। आबूधाबी एयरपोर्ट पर बस के साथ हमारे टूर गाईड अक्षय पवार मिले। बस में सब की सीटस् अलाॅटेड थी। मेरे साथ रश्मि थी। अगले छः-सात दिन बस में रश्मि और रूम में आशा मेरी साथीदार थी। वे दोनों भी मुझ जैसे हि अकेली आई थी। शाम की introduction party में पता चला कि चालीस के ग्रुप में उन्नीस महिलाएं अकेले ही आई थी और रहा सहा डर उडणछू हो गया। रैम्प वाॅक के विनर्स में एक पच्चीस वर्ष के आसपास, एक पैतीस के आसपास तो एक सत्तर के आसपास म...

दादादादी, छोडो डर बनो स्मार्ट।

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थोडे दिन पहले हम स्कूल के जमाने की कुछ सहेलियां हम में से हि एक के घर पर इकट्ठा हुई थी। सभी साठ साल से अधिक आयु की। लंच का कार्यक्रम था। सबने एक एक व्यंजन बनाया था। गप्पें मारते हुए, एक दूसरे के हाथ का स्वाद चखते हुये भोजन तो बढ़िया से हो गया। आराम फ़रमाते हुए एक ने कहा कुल्फी होती तो मजा आता। दूसरी के मुँह से निकला पान भी आ जाता तो सोने पे सुहागा। निचे चौक पर हि सब मिल जाता है पर कौन जायें और लायें। मैंने तुरंत अपना स्मार्ट फोन निकाला और दोनों चीजों का बंदोबस्त किया। सबने कुल्फी और पान का आस्वाद लेते हुए मेरी खूब वाहवाही की। सबका कहना था ये काम तो हमारे बच्चे हि करते हैं। वैसे तो स्मार्ट फोन सभी के पास था। मगर उसका उपयोग नाती पोतों से वीडियो कॉल करना, दोस्तों के साथ WhatsApp chat और पोस्ट का आदान-प्रदान, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया पर रीलस् देखना इन कामों के लिए हि होता था। जिनकी उँगलियों में दर्द है वे मेसेज लिखने के बदले voice messages करेंगे वो भी बच्चों ने सिखाया है तो। कोई एक स्टेप आगे है तो  u tube पर कुकिंग और beauty टिप्स देखेंगे या Ott पर फिल्म या सिरिज देखेंगे। उ...

वाणी जयराम श्रद्धांजलि

 वाणी जयराम संगीत क्षेत्र का एक जाना माना नाम। 30 नवम्बर 1945 को वेल्लोर तमिलनाडु में जन्मी यह प्रसिद्ध गायिका  जानी जाती थी उनके शुद्ध तथा स्पष्ट उच्चारण और सहज गायिकी के लिए। उन्होंने उन्नीस भाषाओं में करीब दस हजार गाने गाये हैं। अन्य भाषाओं में उनके गायन के बारे मुझे अधिक जानकारी तो नही है परंतु उनके द्वारा गाये हिंदी फिल्मी गीतों की मै हमेशा प्रशंसक रही हूँ।  वे बँकींग क्षेत्र में कार्यरत थी। विवाह उपरांत उनके पति श्री जयराम जी के प्रोत्साहन से मुंबई में उन्होंने शास्त्रीय गायन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और बँक की नौकरी छोड़कर गायन को अपना पेशा बना लिया। मुंबई निवास के समय उन्हें हिंदी में गाने का अवसर मिला। 1971 में आई श्री ऋषिकेष मुखर्जी निर्देशित और श्री वसंत देसाई द्वारा संगीतबद्ध  फिल्म 'गुड्डी ' के 'बोले रे पपिहरा' इस गाने से उनकी आवाज घर घर में पहुँच गई। हिंदी फिल्म संगीत जगत में एकछत्र राज करने वालों के लिए यह खतरे की घंटी थी। वाणी जी को अवसर न मिले और उनका करियर समाप्त हो जाये इसके भरसक प्रयास किये गये परंतु हिरे की चमक को कौन छुपा सकता है। वह तो कोयले की...

बेलम गुफाएं

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                                         बेलम गुफाओं में स्थित आरोही निक्षेप  Creative Commons  Attribution-Share Alike 4.0 International  लायसेंस। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ भारत की भौगोलिक विशेषता हैं। इन्हीं पहाडों में स्थित है कईं अज्ञात गुफाएं। गुफा अनुसंधान अभियान द्वारा इनकी खोज का कार्य निरंतर चलता रहा है और कईं गुफाओं की खोज की गई है। बेलम गुफाएं भी गुफा अनुसंधान अभियान द्वारा खोजी गईं प्राकृतिक गुफाएं हैं। स्थान और मार्ग  बेलम गुफाएं आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में बेलम गाँव में स्थित हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन तादीपत्री यहाँ से 30 किमी दूर है जो भारत के कई प्रमुख शहर जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद आदि से भलीभाँति जुड़ा है। तादीपत्री से बेलम गुफाओं तक बस से जा सकते हैं। विशेषताएं  बेलम गुफाएं, भारतीय उपमहाद्वीप की दुसरी सबसे बड़ी गुफाएं है। मेघालय में स्थित क्रिम लियात प्राह गुफाएं सबसे बड़ी गुफाएं हैं परंतु ये पर्यटकों के लिए खुली नहीं है। बेलम गुफाओं मे...

बाघ की बौद्ध गुफाएं

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                                          बाघ की बौद्ध गुफाएं क्रमांक 1-7 This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 3.0 Unported  license. भारत की गुफाओं में बंदिस्त कलाविष्कार की श्रृंखला में आज हम बात करते हैं बाघ की बौद्ध गुफाओं की। गुफाओं का स्थान  बाघ की बौद्ध गुफाएं मध्य प्रदेश के धार जिले में कुक्षी तहसील के अंतर्गत बाघिनी नामक एक छोटी नदी के तट पर विंध्य पर्वत के दक्षिण ढलान पर स्थित है। विंध्य पर्वत का यह हिस्सा मालवा क्षेत्र में  आता है। बाघिनी नदी के नाम से हि गाँव का और गुफाओं का नाम बाघ पडा है। ये गुफाएं धार से 97 किमी और इंदौर से 60 किमी दूरी पर इंदौर और वडोदरा के बिच स्थित है।कुक्षी से गुफाओं का अंतर 18 किमी है। निकटतम रेल्वे स्टेशन मेघानगर है जो इन गुफाओं से 82 किमी दूर है। सड़क मार्ग से गुफाओं तक बस या टैक्सी से सरलता से पहुँच सकते हैं। गुफाओं का निर्माण  बाघ की इन गुफाओं के लिये गुफा शब्द भी थोड़ा असंगत...

खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं

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                                       खम्भालिदा गुफाएं  This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution 2.0 Generic  license   भारत में लगभग दस हजार स्थानों पर गुफाओं में भित्ति चित्र, मूर्तिकला एवं स्थापत्य कला के नमूने मिलें है। इनमें अजंता गुफाओं के भित्तिचित्र तो जगप्रसिद्ध है। अन्य गुफाओं में बंदिस्त कलाविष्कार की श्रृंखला में से हि एक है खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं जो उनकी मूर्तिकला एवं पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी के कारण गुजरात राज्य का एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन गया है।   स्थान और मार्ग  गुजरात के राजकोट ज़िले में गोंडल के पास एक छोटे झरने के तट पर, छोटी छोटी पहाडियों की तलहटी में ये खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं स्थित है। इन गुफाओं की संख्या तीन है। राजकोट शहर भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़क, रेल तथा वायुमार्ग से भलीभाँति जोड़ा गया है। राजकोट से खम्भालिदा का अंतर 65 किमी तथा गोंडल रेल्वे स्टेशन से 27 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 27 क...

बाबासाहेब आम्बेडकर, महिला उत्थान के प्रणेता

संपूर्ण विश्व डाॅ. बाबासाहेब आम्बेडकर जी को दलित समाज के उद्धारक के रूप में जानता है और यह शत प्रतिशत सही है। परंतु उनका कार्य केवल दलित समाज तक हि सीमित नहीं है। तत्कालीन भारतीय समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए भी वे व्यथित थे। पितृसत्तात्मक संस्कृति के दबाव में महिलाओं की इच्छा के खिलाफ विवाह, विवाह उपरांत उत्पीडन, बाल्यावस्था में गर्भधारण, आरोग्य विषयक समस्याएँ, विधवाओं का उत्पीड़न आदि सभी समस्याओं से वे भलीभाँति परिचित थे। वे जानते थे कि यह सारी समस्याएँ समाज के सभी वर्गों की महिलाओं को झेलनी पडती हैं। बाबासाहेब  के अनुसार  इस स्थिति को बदलने का एकमात्र तरीका था "शिक्षा"। डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर महिला मुक्ति के समर्थक थे। उनके अनुसार, यदि हम किसी भी समाज का मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो वह उस समाज में महिलाओं की स्थिति के आधार पर किया जा सकता है। उन्होंने हमेशा कहा कि सभी समुदायों की लड़कियों को भी उतना ही शिक्षित होना चाहिए जितना कि उन समुदायों के लड़के शिक्षित होते हैं।  बाबासाहब का मानना था कि माता-पिता को बचपन से ही अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना च...

मंडला चित्रकला

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                                    तिबेटियन मंडला     मंडला चित्रकला का इतिहास  एशियाई आध्यात्मिक चित्रकला का अध्ययन करते समय हमें मंडला का परिचय मिलता है। मंडला चित्रकला का उल्लेख सर्वप्रथम बुद्ध धम्म संबंधित साहित्य में मिलता है।  ज्ञानप्राप्ति के बाद महात्मा गौतम बुद्ध अपने तत्वज्ञान का प्रचार करने के लिए उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में घूम घूम कर  प्रवचन देते थे जिससे उनके कई शिष्य बन गये। शिष्यों की संख्या बढने पर उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की और इन भिक्षुओं को अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न देशों में भेजा जैसे कि तिबेट, चीन, जापान आदि। ये भिक्षु अपने साथ मंडला चित्रों को भी ले गये जिन्हें वे ध्यानधारणा जैसी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में एक उपकरण के तौर पर उपयोग में लाते थे। मंडला चित्र की रचना और अर्थ  मंडला चित्र एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक उपकरण है। भारत में सभी धर्मों के लोग जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और शिनटोई; मंडला चित्रकला का उपयोग ध्यान ...

पिछवाई चित्रकला

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                                        This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 2.5 Generic  license. 400 वर्ष पूर्व उदयपुर से 50 km दूर राजसमन्द जिले में स्थित नाथद्धारा में वल्लभ संप्रदाय से संबंधित  चित्रकला की शुरुआत हुई जिसे हम नाथद्वारा चित्रकला के तौर पर जानते हैं। नाथद्वारा चित्रकला का प्रमुख हिस्सा है पिछवाई चित्रकला। पिछवाई का अर्थ  पिछवाई अर्थात पिछेवाली। ये चित्र श्रीनाथ जी के मंदिर में मूर्तियों के पिछे टंगे हुए होते हैं अतः आकार में बहुत बडे होते हैं। ये चित्र आमतौर पर कपड़े पर बनायें जाते हैं और इनमें श्रीनाथ जी यानि श्रीकृष्ण का चित्रण होता है। पिछवाई चित्र मंदिर की भव्यता तो बढ़ते हि हैं साथ ही दर्शकों को श्रीनाथ जी के जीवन और चरित्र से परिचित कराते हैं। पिछवाईयों में श्रीकृष्ण की माखनचोरी, रासलीला, गोवर्धन प्रसंग, चीरलीला आदि प्रसंगों को नयनाभिराम रंगों में चित्रित किया जाता है। पिछवाई का एक लोकप्रिय विषय है, '...