संदेश

जुलाई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आभूषण महाराष्ट्र के

चित्र
देशी विदेशी सभी महिलाओं को गहनों से विशेष लगाव होता है।भारत में हर प्रदेश की महिलाओं के कुछ विशिष्ट आभूषण होते है।उत्तर भारत में मांगटीका का प्रचलन है तो दक्षिण भारत में बालों की चोटी या जूडे में सजाये जाने वाले फूल लोकप्रिय है। महाराष्ट्रियन महिलाओं के मंगलसूत्र और नथ तो अब सभी भारतीय महिलाओं में प्रसिद्धी पा चुका है और बहुत लोकप्रिय भी है। मगर कुछ महाराष्ट्रियन आभूषणों के बारे में अन्य भारतीयों को जानकारी नही होगी जैसे कि 1 कोल्हापुरी साज : कोल्हापुर जो कि अंबाबाई मंदिर और चप्पल के लिए प्रसिद्ध है उसी कोल्हापुर के नाम का गले में पहना जाने वाला यह आभूषण 'कोल्हापुरी साज' जिसे महाराष्ट्र में मंगलसूत्र के बराबर महत्व है। परंपरागत रूप से इसमें इक्कीस पत्ते होते है जिन्हे मराठी में पानाडी कहते है। बीच वाला पत्ता थोडा बडा लॉकेट जैसा जिसे साजघाट कहते है। उसपर किर्तिमुख बना हुआ होता है जो रक्षण करता है। साजघाट के मध्य स्थान पर लाल नग लगा होता है। अन्य बीस पत्तों पर तुलसी, कमल, ऐरावत, वाघनख, कामधेनु, तोता, शंख, चक्र, मोरपंख, मत्स्य, चंद्र, सूर्य, नागदेवता, बेलपत्र आदि शुभ चिन्ह बने होत...

काॅम्प्लिमेंटस्

कुछ वर्ष पहले एक all women group के साथ दुबई प्रवास किया था। सभी महिलायें विभिन्न आयु गट की थी। सब अपने अपने ग्रुप के साथ थी। कुछ अकेली भी थी। इनमें एक सदस्या ऐसी थी जो हर ग्रुप के साथ enjoy कर रही थी। हालांकि वह उम्र में सबसे बडी थी मगर सबसे छोटी सदस्या के साथ भी उनकी दोस्ती थी। इसका कारण शायद यह था कि उन्हे हर एक में कोई न कोई गुण नजर आता था। वे हर किसी को कुछ न कुछ compliment जरूर देती थी। किसी के ड्रेस पर तो किसी के बालों पर तो किसी के स्माईल पर। मुझ से भी उन्होंने कहा, "अरे, कितना फास्ट चलते हो आप। कितनी एनर्जी है आपमें।" बस हो गई दोस्ती। Compliment किसे पसंद नही आता? अब इसतरह सबकी तारीफ करने के पिछे उनका कोई स्वार्थ तो होगा नही क्यों कि enjoy करने के लिए उनका अपना ग्रुप था और सब जानते थे कि छह दिन बाद हर एक को अपने रास्ते निकलना है। शायद उनकी नज़र हि इतनी साफ थी कि केवल अच्छाई को हि  परखती थी और दिल इतना बड़ा कि अच्छाई की तारीफ करने से अपने आप रोक नही पाती थी और बस माहौल खुशनुमा और दोस्ती भरा हो जाता था। मार्क ट्वेन का कथन है, 'I can live for two months on a good co...

श्रेष्ठ दार्शनिक कबीर

चित्र
                                        जेष्ठ मास की पूर्णिमा संत कबीर दास की जयंती के रूप में मनाई जाती है जो इस वर्ष 2026 में 29 जून को मनाई गई। मेरे वाचन व्यासंग के प्रवास में कबीर दास जी के बारे में जो कुछ मैंने जाना और समझा उसका संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण।  पंद्रहवी सदी के इस महान भारतीय दार्शनिक का स्थान हिंदी भक्ति धारा के कवियों में बहुत उँचा है। कबीर दासजी की भाषा राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खडी बोली, अवधी और ब्रजवासी के शब्दों की पंचमेल खिचड़ी है। इन सभी भाषाओं के शब्द प्रयोग करते हुए उन्होंने अपनी भाषा को सरल और सुबोध बनाया ताकि आम आदमी समझ सके। 'पोथी पढि पढि जग मुवा, पंडित भया न कोय।                              ढाई आखर प्रेम का, पढे सो पंडित होय।'                               इन शब्दों में प्रेम की महिमा बताने वाले कबीर ...

ज्ञानगंगा

चित्र
                                          आज एक स्मार्ट फोन हाथ में है तो यह प्रश्न तो बचा नही कि समय कैसे काटे लेकिन अब 'क्या करें कि ना करें कैसी मुश्किल हाय' यह परीस्थिति उत्पन्न हो गई है। इसका कारण है उस स्मार्ट फोन के जरिए हम तक पहुँचने वाली अविरल ज्ञानगंगा। हर छोटी छोटी बात पर तरह-तरह का ज्ञान उपलब्ध है, जो हम सब रोज पढते हैं और समझ आता है उसमें बहुत हि विरोधाभास है। और सब बातों को छोड़िये मगर जो बातें हमें सीधे सीधे प्रभावित करती है जैसे खानपान, सेहत, व्यायाम आदि के बारे क्या जानकारी उपलब्ध है और उसमें कितना और क्या क्या विरोधाभास है यह देखते है। एक कहता है हर दो दो घंटे में खाना खाओ चाहे थोडा थोडा खाओ। दूसरा कहता है जब भूख लगे तब खाओ तो तिसरे का विचार है दिन में केवल दो हि बार खाओ चाहे हर बार 45 मिनट तक खाते रहो। सोचो जरा 45 मिनट में कितना खाना जा सकता है पेट में। अब हम बच्चे तो रहे नही कि 45 मिनट तक एक रोटि भी खत्म न हो और माँ डाँटती रह जाए,"खा न जल्दी।" कोई सलाह देगा दिनभर ...