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ज्ञानगंगा

आज एक स्मार्ट फोन हाथ में है तो यह प्रश्न तो बचा नही कि समय कैसे काटे लेकिन अब 'क्या करें कि ना करें कैसी मुश्किल हाय' यह परीस्थिति उत्पन्न हो गई है। इसका कारण है उस स्मार्ट फोन के जरिए हम तक पहुँचने वाली अविरल ज्ञानगंगा। हर छोटी छोटी बात पर तरह-तरह का ज्ञान उपलब्ध है, जो हम सब रोज पढते हैं और समझ आता है उसमें बहुत हि विरोधाभास है। और सब बातों को छोड़िये मगर जो बातें हमें सीधे सीधे प्रभावित करती है जैसे खानपान, सेहत, व्यायाम आदि के बारे क्या जानकारी उपलब्ध है और उसमें कितना और क्या क्या विरोधाभास है यह देखते है। एक कहता है हर दो दो घंटे में खाना खाओ चाहे थोडा थोडा खाओ। दूसरा कहता है जब भूख लगे तब खाओ तो तिसरे का विचार है दिन में केवल दो हि बार खाओ चाहे हर बार 45 मिनट तक खाते रहो। सोचो जरा 45 मिनट में कितना खाना जा सकता है पेट में। अब हम बच्चे तो रहे नही कि 45 मिनट तक एक रोटि भी खत्म न हो और माँ डाँटती रह जाए,"खा न जल्दी।" कोई सलाह देगा दिनभर में 8 से 9 ग्लास पानी पिओ तो कोई कहेगा ज्यादा पानी पीकर किडनी पे जोर मत डालो। एक कहता है जब प्यास लगे तभी पानी पिओ तो दूसरे के व...

मै वापस आऊंगा

सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखना तो मैंने कब का छोड हि दिया है।एक जमाने में हर तरह की जद्दोजहद करके हर फिल्म देखने की मेरी पूरी कोशिश रहती थी। आज दस साल से अधिक हो गए घर के एकदम पास हि माॅल और थियेटर बने हुए मगर अबतक दो हि फिल्मे देखी है। अब इसमें मेरी उम्र का कसूर है कि आजकल की फिल्मों का पता नही। या फिर OTT platforms का योगदान रहा होगा। स्मार्ट बाज़ार से निकलते समय पोस्टर पर नसीरूद्दीन शाह और दिलजीत दोसांज के चेहरे देखे और इम्तियाज अली का नाम पढा तो उत्सुकता जागी। 'मैं वापस आऊंगा' नाम से तो love story लग रही थी। मिडिया में फिल्म की कोई चर्चा भी नही थी तो मन में अच्छी या बुरी ऐसी कोई धारणा भी नही थी। लगा कि शायद भीड भी न हो। तो एक accidental movie watching का कार्यक्रम बन गया। आशा के विपरित अच्छी खासी भीड थी। फिल्मों के प्रचलित सांचे की तरह इस  फिल्म में नायक या खलनायक कोई नही। फिल्म का कथानक जो देश के विभाजन से जुडा है, वही है सबकुछ। फिल्म को प्रेम कहानी कह सकते है जो अपने अस्तित्व से प्रेम की बात कहती है। फिल्म में संगीत ए. आर. रहमान ने दिया है जो शांत, सुकून भरा और सुमधुर है। ...

स्पर्श का जादू

आजकल एक चाय का विज्ञापन चल रहा है जिसमें एक नेत्रहीन व्यक्ती कहता है, "हमें सुगंध से पता चलता  है कि अच्छी है या नही।" वाकई उन्हे प्रकृति द्वारा यह देण मिली है। साथ हि स्पर्श के बारे में भी वे काफी संवेदनशील होते है। वैसे स्पर्श का करिश्मा तो हम सभी हर घडी अनुभव करते है। स्कूल में ज्ञानेंद्रियों के बारे में पढते हुए बस यही जाना कि स्पर्श में न शब्दों की आवश्यकता है ना भाषा की। नवजात शिशु माँ की गोद में आते हि रोना बंद करता है क्यों कि वह उस स्पर्श को तब से पहचानता है जब से माँ के गर्भ में स्थित था। उस नवजात का स्पर्श भी कितना मुलायम, एकदम मक्खन सा। और माँ का स्पर्श? ममता से भरा हुआ, संवेदनशील। वही पिता का स्पर्श आश्वासक, दुनिया जितने की प्रेरणा देने वाला। दादा दादी, नाना नानी के दुलार भरे स्पर्श सारी गलतियाँ नजरअंदाज कर के हौसला बढानेवाले।  जीवन का सबसे प्यारा रिश्ता मैत्री का। मित्र का स्पर्श आनंद और उत्साह देनेवाला। कितनी ही लडाईयां हो एक प्यार वाली झप्पी सारे गिले शिकवे दूर कर देगी। कितना हि संकट भरा समय हो कंधे पर मित्र का स्पर्श और 'all is well ' के शब्द।  आप संक...

यु.ए.ई. प्रवास

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                                               अपने बेटे और पति को बाय कहते हुए मैंने मुंबई एयरपोर्ट के भीतर प्रवेश किया और दिल की धड़कन तेज़ हुई। अपने परिवार के साथ सुरक्षितता से ढेर सारा भ्रमण कर लेने के बाद आज मै वीणा वर्ल्ड के लेडिज स्पेशल टूर पर अकेले निकली थी। चेक इन के पास हमारे टूर मॅनेजर अक्षय वैद्य मिले। डिनर की व्यवस्था एयरपोर्ट पर हि थी जहाँ भावना मिली। वो भी अकेली थी। साथ डिनर कीया। दिल की धड़कन अब काबू में थी। फ़्लाईट में आशा एन सी साथ बैठी थी। आबूधाबी एयरपोर्ट पर बस के साथ हमारे टूर गाईड अक्षय पवार मिले। बस में सब की सीटस् अलाॅटेड थी। मेरे साथ रश्मि थी। अगले छः-सात दिन बस में रश्मि और रूम में आशा मेरी साथीदार थी। वे दोनों भी मुझ जैसे हि अकेली आई थी। शाम की introduction party में पता चला कि चालीस के ग्रुप में उन्नीस महिलाएं अकेले ही आई थी और रहा सहा डर उडणछू हो गया। रैम्प वाॅक के विनर्स में एक पच्चीस वर्ष के आसपास, एक पैतीस के आसपास तो एक सत्तर के आसपास म...

दादादादी, छोडो डर बनो स्मार्ट।

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थोडे दिन पहले हम स्कूल के जमाने की कुछ सहेलियां हम में से हि एक के घर पर इकट्ठा हुई थी। सभी साठ साल से अधिक आयु की। लंच का कार्यक्रम था। सबने एक एक व्यंजन बनाया था। गप्पें मारते हुए, एक दूसरे के हाथ का स्वाद चखते हुये भोजन तो बढ़िया से हो गया। आराम फ़रमाते हुए एक ने कहा कुल्फी होती तो मजा आता। दूसरी के मुँह से निकला पान भी आ जाता तो सोने पे सुहागा। निचे चौक पर हि सब मिल जाता है पर कौन जायें और लायें। मैंने तुरंत अपना स्मार्ट फोन निकाला और दोनों चीजों का बंदोबस्त किया। सबने कुल्फी और पान का आस्वाद लेते हुए मेरी खूब वाहवाही की। सबका कहना था ये काम तो हमारे बच्चे हि करते हैं। वैसे तो स्मार्ट फोन सभी के पास था। मगर उसका उपयोग नाती पोतों से वीडियो कॉल करना, दोस्तों के साथ WhatsApp chat और पोस्ट का आदान-प्रदान, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया पर रीलस् देखना इन कामों के लिए हि होता था। जिनकी उँगलियों में दर्द है वे मेसेज लिखने के बदले voice messages करेंगे वो भी बच्चों ने सिखाया है तो। कोई एक स्टेप आगे है तो  u tube पर कुकिंग और beauty टिप्स देखेंगे या Ott पर फिल्म या सिरिज देखेंगे। उ...

वाणी जयराम श्रद्धांजलि

 वाणी जयराम संगीत क्षेत्र का एक जाना माना नाम। 30 नवम्बर 1945 को वेल्लोर तमिलनाडु में जन्मी यह प्रसिद्ध गायिका  जानी जाती थी उनके शुद्ध तथा स्पष्ट उच्चारण और सहज गायिकी के लिए। उन्होंने उन्नीस भाषाओं में करीब दस हजार गाने गाये हैं। अन्य भाषाओं में उनके गायन के बारे मुझे अधिक जानकारी तो नही है परंतु उनके द्वारा गाये हिंदी फिल्मी गीतों की मै हमेशा प्रशंसक रही हूँ।  वे बँकींग क्षेत्र में कार्यरत थी। विवाह उपरांत उनके पति श्री जयराम जी के प्रोत्साहन से मुंबई में उन्होंने शास्त्रीय गायन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और बँक की नौकरी छोड़कर गायन को अपना पेशा बना लिया। मुंबई निवास के समय उन्हें हिंदी में गाने का अवसर मिला। 1971 में आई श्री ऋषिकेष मुखर्जी निर्देशित और श्री वसंत देसाई द्वारा संगीतबद्ध  फिल्म 'गुड्डी ' के 'बोले रे पपिहरा' इस गाने से उनकी आवाज घर घर में पहुँच गई। हिंदी फिल्म संगीत जगत में एकछत्र राज करने वालों के लिए यह खतरे की घंटी थी। वाणी जी को अवसर न मिले और उनका करियर समाप्त हो जाये इसके भरसक प्रयास किये गये परंतु हिरे की चमक को कौन छुपा सकता है। वह तो कोयले की...

बेलम गुफाएं

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                                         बेलम गुफाओं में स्थित आरोही निक्षेप  Creative Commons  Attribution-Share Alike 4.0 International  लायसेंस। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ भारत की भौगोलिक विशेषता हैं। इन्हीं पहाडों में स्थित है कईं अज्ञात गुफाएं। गुफा अनुसंधान अभियान द्वारा इनकी खोज का कार्य निरंतर चलता रहा है और कईं गुफाओं की खोज की गई है। बेलम गुफाएं भी गुफा अनुसंधान अभियान द्वारा खोजी गईं प्राकृतिक गुफाएं हैं। स्थान और मार्ग  बेलम गुफाएं आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में बेलम गाँव में स्थित हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन तादीपत्री यहाँ से 30 किमी दूर है जो भारत के कई प्रमुख शहर जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद आदि से भलीभाँति जुड़ा है। तादीपत्री से बेलम गुफाओं तक बस से जा सकते हैं। विशेषताएं  बेलम गुफाएं, भारतीय उपमहाद्वीप की दुसरी सबसे बड़ी गुफाएं है। मेघालय में स्थित क्रिम लियात प्राह गुफाएं सबसे बड़ी गुफाएं हैं परंतु ये पर्यटकों के लिए खुली नहीं है। बेलम गुफाओं मे...