पिछवाई चित्रकला
400 वर्ष पूर्व उदयपुर से 50 km दूर राजसमन्द जिले में स्थित नाथद्धारा में वल्लभ संप्रदाय से संबंधित चित्रकला की शुरुआत हुई जिसे हम नाथद्वारा चित्रकला के तौर पर जानते हैं। नाथद्वारा चित्रकला का प्रमुख हिस्सा है पिछवाई चित्रकला।
पिछवाई का अर्थ
पिछवाई अर्थात पिछेवाली। ये चित्र श्रीनाथ जी के मंदिर में मूर्तियों के पिछे टंगे हुए होते हैं अतः आकार में बहुत बडे होते हैं। ये चित्र आमतौर पर कपड़े पर बनायें जाते हैं और इनमें श्रीनाथ जी यानि श्रीकृष्ण का चित्रण होता है। पिछवाई चित्र मंदिर की भव्यता तो बढ़ते हि हैं साथ ही दर्शकों को श्रीनाथ जी के जीवन और चरित्र से परिचित कराते हैं। पिछवाईयों में श्रीकृष्ण की माखनचोरी, रासलीला, गोवर्धन प्रसंग, चीरलीला आदि प्रसंगों को नयनाभिराम रंगों में चित्रित किया जाता है। पिछवाई का एक लोकप्रिय विषय है, 'रागमाला' जिसमें कृष्ण और राधा की प्रेमलिलाओं का चित्रांकन होता हैं। 'बारहमासा' नामक पिछवाईयों में विभिन्न मौसमों का सुन्दर चित्रण होता है। श्रीनाथ जी के दैनंदिन दर्शन के लिए ये पिछवाईयाँ रोज दिन विशेष के अनुसार बदली जाती हैं।
पिछवाई चित्रकला की विधि
पिछवाई बनाने के सदियों से चले आ रहे तरीके के अनुसार हैंगर पर कपड़ा लटकाकर चित्रांकन किया जाता है। हकीक के गोटे (पत्थर) से लगभग दो या तीन बार घिसाई की जाती है जिससे रंग कपड़े में समान रूप से समा जाते है। इसतरह बनाई गई पिछवाई की आयु दो सौ तीन सौ सालों तक होती हैं। ऐसी कई पिछवाईयाँ आज भी मंदिरों में सुरक्षित हैं। आजकल जमीन या मेज पर कपड़ा फैलाकर भी पिछवाई बनाते हैं मगर वे अधिक दिनों तक टिकती नही हैं। कुछ हि दिनों में रंग कपड़े को छोडने लगते हैं।
पिछवाई में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग सदियों से हो रहा है। रंगों को पक्का करने के लिए बबूल का गोंद मिलाया जाता है। माँग के अनुसार इसमें सोने व चांदी के रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। महँगी पिछवाई में असली सोने व चाँदी के काम की सजावट की जाती है। असली सुनहरा और चाँदी रंग सोने व चाँदी के वर्क को गोन्द के साथ घिस कर बनाया जाता है। सर्वप्रथम बारीक कलम की सहायता से गेरूएँ रंग से रेखांकित करके विषय के अनुसार खाका बना लिया जाता है। पृष्ठभूमि में रंग भरने के बाद आकृतियों की देह तथा वस्त्र आदि में विभिन्न रंग भरे जाते हैं। इसके बाद स्वर्णिम रंग के प्रयोग से आभूषण और अलंकार बनायें जाते हैं। अंत में गहरे रंग और बारीक ब्रश की सहायता से पक्का रेखांकन किया जाता है। पिछवाई चित्र के रंगों को टिकाऊ और चमकदार बनाने हकीक के गोटे से घिसाई की जाती है। श्रीनाथ जी और देवताओं के अलंकारों को असली सोने के पावडर से रंग दिया जाता है अतः ये चित्र महंगे होते हैं। आजकल सोने के पावडर के बदले सुनहरे रंग का उपयोग होता है और सुंदरता बढाने के लिए मोती तथा नग लगाते हैं।
पिछवाई के पर्दे पर मध्य में एक प्रमुख दृश्य होता है जो श्रीकृष्ण या राधाकृष्ण का होता है। उसके चारों ओर दो पतले किनारों के बीच में एक चौड़ा किनारा या बोर्डर बनाया जाता है। इस किनारे के लिए फूल और पत्तियों की अल्पनाओं के विभिन्न आकारों से पूरी बेल बनाई जाती है।
पिछवाई कला के कलाकार
पिछवाई बनाने के लिए अनुभवी और कुशल हाथों की आवश्यकता होती है।आम तौर पर पिछवाई के प्रमुख दृश्य बनाने वाले और किनारा बनाने वाले कलाकार अलग-अलग होते हैं। किनारों पर काम करने वाले कलाकार प्रमुख कारीगर के शिष्य या बच्चे होते हैं। लगभग पूरा परिवार ही इसी कार्य के लिए समर्पित रहता है।
पिछवाई चित्रकला को समर्पित सभी महानुभाव कलाकारों में महेंद्र शर्मा और रामकिशन वर्मा पिछले चार दशकों से श्रीकृष्ण के गोविंद रूप और श्रीनाथ जी रूप का चित्रांकन करते आ रहे हैं और किसी समारोह स्थल पर अपनी कला का प्रदर्शन करने में माहिर है। उस्ताद घनश्याम शर्मा जी पिछवाई कला को निशुल्क सिखाते है। बहुत से सरकारी संस्थाओं, स्कूलों और काॅलेजों में अपने व्याख्यानों द्वारा पिछवाई चित्रकला की जानकारी लोगों तक पहुँचाने का उन्होंने प्रयास किया है।
पिछवाई चित्रकला से जुड़े चित्रकारों में प्रमुख नाम है घासीरामजी, रेवाशंकरजी, उस्ताद नरोत्तम नारायणजी, देवीलालजी, शंकरलालजी, उस्ताद घनश्याम शर्माजी, इंद्र शर्माजी, द्वारकालालजी, भूरिलाल शर्माजी, खूबीराम शर्माजी, तुलसीदास शर्माजी आदि। इन कलाकारों में से कई कलाकार राष्ट्रीय तथा आंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।
पिछवाई चित्रकला का व्यापारीकरण
अन्य कलाओं की तरह पिछवाई चित्रकला भी बढते हुए व्यापारीकरण के कारण मंदिरों के दायरे से बाहर निकल कर बाजारों से होते हुए घरों के ड्राईंगरूम तक पहुँच गई है। मांग के अनुसार पिछवाई के आकार छोटे हो गए है। हस्तकला से संबंधित प्रतिष्ठानों में यह पिछवाईयाँ, उनमें प्रयुक्त सामग्री एवं प्रदर्शित कला के स्तर के अनुसार सस्ते से लेकर महंगे दामों पर उपलब्ध हैं। किसी भी कला का व्यापारीकरण तो आवश्यक होता हि है क्यों कि उसपर कलाकारों का जीवनयापन निर्भर है परंतु पिछवाई जैसी पवित्र कला की पवित्रता को संजोये रखना उपयोगकर्ता के हाथ में है। आशा है हम सब इस का ध्यान रखेंगे।
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तुम्ही जी माहिती दिली ती खूप चांगली आहे मला त्याबद्दल फारसे माहीत नव्हते आपल्या देशातील कलाकृतीची तुम्ही माहिती दिली धन्यवाद
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