ज्ञानगंगा

आज एक स्मार्ट फोन हाथ में है तो यह प्रश्न तो बचा नही कि समय कैसे काटे लेकिन अब 'क्या करें कि ना करें कैसी मुश्किल हाय' यह परीस्थिति उत्पन्न हो गई है। इसका कारण है उस स्मार्ट फोन के जरिए हम तक पहुँचने वाली अविरल ज्ञानगंगा। हर छोटी छोटी बात पर तरह-तरह का ज्ञान उपलब्ध है, जो हम सब रोज पढते हैं और समझ आता है उसमें बहुत हि विरोधाभास है।

और सब बातों को छोड़िये मगर जो बातें हमें सीधे सीधे प्रभावित करती है जैसे खानपान, सेहत, व्यायाम आदि के बारे क्या जानकारी उपलब्ध है और उसमें कितना और क्या क्या विरोधाभास है यह देखते है।

एक कहता है हर दो दो घंटे में खाना खाओ चाहे थोडा थोडा खाओ। दूसरा कहता है जब भूख लगे तब खाओ तो तिसरे का विचार है दिन में केवल दो हि बार खाओ चाहे हर बार 45 मिनट तक खाते रहो। सोचो जरा 45 मिनट में कितना खाना जा सकता है पेट में। अब हम बच्चे तो रहे नही कि 45 मिनट तक एक रोटि भी खत्म न हो और माँ डाँटती रह जाए,"खा न जल्दी।"

कोई सलाह देगा दिनभर में 8 से 9 ग्लास पानी पिओ तो कोई कहेगा ज्यादा पानी पीकर किडनी पे जोर मत डालो। एक कहता है जब प्यास लगे तभी पानी पिओ तो दूसरे के विचार से शाम सात बजे के बाद पानी मत पीओ। खाना खाने के पहले पानी पीना है कि खाने के बाद पीना है या फिर खाना खाते खाते पानी पीना है इस बात पर भी मतभिन्नता है।

किसी के अनुसार शाकाहार सर्वोत्तम और मांसाहार व्यर्ज्य तो किसी को मांसाहार में भरपूर प्रोटीन्स और फाइबर होने के फायदे नजर आते है। और कुछ लोगों के लिए मांसाहार में केवल फिश हि खाने योग्य है, chicken या mutton नही।

एक के हिसाब से फलों में sugar होती है जो हानिकारक है तो दूसरा कहेंगा फलों में नैसर्गिक sugar होती है इसलिए कोई अपाय नही होगा। रोज फल तो खाने हि चाहिए। Avocado, dragon fruit आदि फलों के लिए सलाह दि जाती है कि ये सारे विदेशी फल अपने देशी शरीर के लिए सही नही और उनके देशी विकल्प भी सुझाए जाते हैं।

अबतक सुनते थे कि चलना एक उत्तम और सर्वांगीण व्यायाम है। अब ज्ञानगंगा में डुबकी के बाद पता चला कि चलने से तो केवल cardio exercise होती है। बढती उम्र में strength बढ़ाने के लिए थोडा थोडा वेट लिफ्टिंग भी जरूरी है। तो कोई योग और प्राणायाम को सर्वोत्तम बतायेगा। 

इतने सारे ज्ञान के इस तूफानी प्रवाह में फंसकर हम असमंजस में पड़ जाते है और कोई भी निर्णय नही कर पाते कि क्या अपनायें।बस पोस्ट के बाद पोस्ट पढ़ते रहते है और कृति शून्य। सबके अलग अलग विचार है क्यो कि सबके अनुभव भी तो अलग है। हर किसी का शरीर, परिस्थिती, स्वभाव सब एक दूसरे से भिन्न। 

अपनी जीवनशैली में बदलाव लाते समय यह याद रखना जरूरी है कि 'परफेक्ट जीवनशैली' ऐसा कुछ नही होता। अपनी दिनचर्या खुद तय करें। अपना शरीर स्वयं हि बताता है कि क्या भारी पड रहा है और क्या अच्छा लग रहा है। जीवनशैली यह एक व्यक्तिगत बात है। उसमें बदलाव एकदम से तो नही हो सकते। हाँ, जितना अपना शरीर सह सके और मन आनंदित रह सके, उतना ठीक है। साधारण तौर पर पौष्टिक सुपाच्य आहार, चालीस पैंतालीस मिनट व्यायाम, सात आठ घंटे नींद और मन को आनंद दे ऐसा कोई शौक या कोई मित्र। इतना बस है। सर्वोत्तम की खोज में ना पड़कर, 'मै क्या कर पाऊंगा या पाऊंगी' यह सोचना ज्यादा जरूरी है। सुनो सबकी और मानो अपने शरीर, मन और डॉक्टर की।

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