मै वापस आऊंगा

सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखना तो मैंने कब का छोड हि दिया है।एक जमाने में हर तरह की जद्दोजहद करके हर फिल्म देखने की मेरी पूरी कोशिश रहती थी। आज दस साल से अधिक हो गए घर के एकदम पास हि माॅल और थियेटर बने हुए मगर अबतक दो हि फिल्मे देखी है। अब इसमें मेरी उम्र का कसूर है कि आजकल की फिल्मों का पता नही। या फिर OTT platforms का योगदान रहा होगा।

स्मार्ट बाज़ार से निकलते समय पोस्टर पर नसीरूद्दीन शाह और दिलजीत दोसांज के चेहरे देखे और इम्तियाज अली का नाम पढा तो उत्सुकता जागी। 'मैं वापस आऊंगा' नाम से तो love story लग रही थी। मिडिया में फिल्म की कोई चर्चा भी नही थी तो मन में अच्छी या बुरी ऐसी कोई धारणा भी नही थी। लगा कि शायद भीड भी न हो। तो एक accidental movie watching का कार्यक्रम बन गया। आशा के विपरित अच्छी खासी भीड थी।

फिल्मों के प्रचलित सांचे की तरह इस  फिल्म में नायक या खलनायक कोई नही। फिल्म का कथानक जो देश के विभाजन से जुडा है, वही है सबकुछ। फिल्म को प्रेम कहानी कह सकते है जो अपने अस्तित्व से प्रेम की बात कहती है। फिल्म में संगीत ए. आर. रहमान ने दिया है जो शांत, सुकून भरा और सुमधुर है। फिल्म में आठ गाने है। थोडा सा पंजाबी स्टाईल है। अब कहानी जो पंजाब की है। 

नसीरूद्दीन शाह तो एक मंजे हुए अभिनेता है हि। रंगमंच से जुडे होने के कारण उनकी संवाद शैली उनका plus point है। मगर इस फिल्म में अधिक संवादों के बिना भी, डिमेंशिया से पीडित, 95 वर्षीय ईशरसिंह ग्रेवाल की भुमिका में नसीरूद्दीन शाह ने जो कुछ किया है वह अभिनय की पुस्तक में एक नया अध्याय लिखने लायक है। दिलजीत दोसांज ने निवैरसिंह और शर्वरी ने जिया की भूमिकाएं संजीदगी और समझ के साथ निभाई है। वेदांग रैना के रूप में हिंदी सिनेसृष्टी को एक सुन्दर सजिला नायक हि नही अभिनेता मिला है। इस फिल्म में किनू की भुमिका में वेदांग रैनाने अपने आप को अभिनेता के रूप में साबित किया है। 

फिल्म के संवाद जो स्वयं निर्देशक ने लिखे है, बिना किसी उत्तेजक भाषा के परिस्थिती की दाहकता आप तक पहुँचाते है। एक संवाद है, "औरतों का मजहब पता नही चलता इसलिए पहले मर्द सरहद पार जायेंगे।" साधारण सा लगने वाला यह संवाद थोडा सोचने पर मन सिहर जाता है। मर्द सारे पहले चले गये। महिलाएं केवल रह गई। क्या बिती होगी उन पर? उन अनगिनत गुमनाम महिलाओं कि वेदना को भी यह फिल्म अधोरेखित करती  है। हीट या फ्लाप का पता नही मगर फिल्म देखने लायक तो अवश्य हि है।

बाॅर्डर से दूर रहनेवाले हम लोगों ने विभाजन की त्रासदी को इतिहास में, कहानियों में और फिल्मों में पढा और देखा है। मगर बाॅर्डर पर रहनेवालों ने उस त्रासदी को अपने शरीर और मन पर झेला है। सहा है। न जाने कितनी जानें गयी, कितने घर जले, कितने लोग अपनों से बिछड गयें। इस फिल्म में त्रासदी है, जख्म है, वेदना है मगर नफरत नही है। विभाजन की त्रासदी से उत्पन्न नफरत को दबाकर इन्सान के अंतर्मन का प्यार हावी हो जाता है। इन्सानियत प्रबल हो जाती है। और यह बात दिग्दर्शक इम्तियाज अली ने बहुत हि संवेदनशीलता के साथ उतनी हि सुंदरता से दिखाई है।

बडे बडे कलात्मक सेट, कीमती पोशाख और आभूषण, रोमांचक दृश्य मालिकायें, वेगवान संपादन, उच्च स्वर का संगीत, उत्तेजक संवाद, घृणा, हिंसा, नग्नता इन सबसे फिल्म की मनोरंजन करने की क्षमता शायद बढती होगी परंतु भारतीय सिनेमा को एक कला के रूप में जिवित रखने के लिए कभी कभी कोई 'लापता लेडिज' या 'मै वापस आऊंगा' जैसी फिल्म का बनना और चलना आवश्यक लगता है।

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