महाराष्ट्र की खाद्य संस्कृति भाग 2
इस लेख के प्रथम भाग ' महाराष्ट्र की खाद्य संस्कृति भाग 1' में हमने कोंकण और मुंबई की खाद्य संस्कृति के बारे चर्चा की थी। इस दूसरे भाग में हम मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के खानपान की चर्चा करेंगे। मराठवाड़ा की खाद्य संस्कृति महाराष्ट्र का मराठवाड़ा विभाग आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की सीमा पर होने के कारण वहाँ के सुशीला और आप्पे जैसे पदार्थ मराठवाड़ा में भी बनने लगे और वही के हो गये। आज भी शादी ब्याह में दाक्षिणात्य महाराज खाना बनाते हैं। यहाँ के कुतंलगीरी पेढे प्रसिद्ध हैं जो कम मिठे होते हैं। मराठवाड़ा में तिलहन का उत्पादन अधिक होने के कारण मूँगफली, तिल और अलसी का उपयोग भी खानपान में अधिक होता है। इन पदार्थों की सूखी चटनी जिन्हें 'भुरका' कहते है, हर घर में रहती हि है। ज्वार के पदार्थ यहाँ ज्वार की पैदावार बहुतायात में होने के कारण ज्वार के ढेर सारे पदार्थ बनायें जाते हैं जैसे ज्वार के आटे का हलुआ और खीर, ज्वार के आटे का उपमा जो छाछ डालकर बनाया जाता है, ज्वार और उडद के मिक्स आटे की भाकरी, थालिपिठ, धिरडी और दशमी (दूध से आटा गूंथकर बनाई हुई रोटी) सारे हि एक से एक स्वादि...