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खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं

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                                       खम्भालिदा गुफाएं  This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution 2.0 Generic  license   भारत में लगभग दस हजार स्थानों पर गुफाओं में भित्ति चित्र, मूर्तिकला एवं स्थापत्य कला के नमूने मिलें है। इनमें अजंता गुफाओं के भित्तिचित्र तो जगप्रसिद्ध है। अन्य गुफाओं में बंदिस्त कलाविष्कार की श्रृंखला में से हि एक है खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं जो उनकी मूर्तिकला एवं पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी के कारण गुजरात राज्य का एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन गया है।   स्थान और मार्ग  गुजरात के राजकोट ज़िले में गोंडल के पास एक छोटे झरने के तट पर, छोटी छोटी पहाडियों की तलहटी में ये खम्भालिदा की बौद्ध गुफाएं स्थित है। इन गुफाओं की संख्या तीन है। राजकोट शहर भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़क, रेल तथा वायुमार्ग से भलीभाँति जोड़ा गया है। राजकोट से खम्भालिदा का अंतर 65 किमी तथा गोंडल रेल्वे स्टेशन से 27 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 27 क...

बाबासाहेब आम्बेडकर, महिला उत्थान के प्रणेता

संपूर्ण विश्व डाॅ. बाबासाहेब आम्बेडकर जी को दलित समाज के उद्धारक के रूप में जानता है और यह शत प्रतिशत सही है। परंतु उनका कार्य केवल दलित समाज तक हि सीमित नहीं है। तत्कालीन भारतीय समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए भी वे व्यथित थे। पितृसत्तात्मक संस्कृति के दबाव में महिलाओं की इच्छा के खिलाफ विवाह, विवाह उपरांत उत्पीडन, बाल्यावस्था में गर्भधारण, आरोग्य विषयक समस्याएँ, विधवाओं का उत्पीड़न आदि सभी समस्याओं से वे भलीभाँति परिचित थे। वे जानते थे कि यह सारी समस्याएँ समाज के सभी वर्गों की महिलाओं को झेलनी पडती हैं। बाबासाहेब  के अनुसार  इस स्थिति को बदलने का एकमात्र तरीका था "शिक्षा"। डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर महिला मुक्ति के समर्थक थे। उनके अनुसार, यदि हम किसी भी समाज का मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो वह उस समाज में महिलाओं की स्थिति के आधार पर किया जा सकता है। उन्होंने हमेशा कहा कि सभी समुदायों की लड़कियों को भी उतना ही शिक्षित होना चाहिए जितना कि उन समुदायों के लड़के शिक्षित होते हैं।  बाबासाहब का मानना था कि माता-पिता को बचपन से ही अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना च...

मंडला चित्रकला

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                                    तिबेटियन मंडला     मंडला चित्रकला का इतिहास  एशियाई आध्यात्मिक चित्रकला का अध्ययन करते समय हमें मंडला का परिचय मिलता है। मंडला चित्रकला का उल्लेख सर्वप्रथम बुद्ध धम्म संबंधित साहित्य में मिलता है।  ज्ञानप्राप्ति के बाद महात्मा गौतम बुद्ध अपने तत्वज्ञान का प्रचार करने के लिए उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में घूम घूम कर  प्रवचन देते थे जिससे उनके कई शिष्य बन गये। शिष्यों की संख्या बढने पर उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की और इन भिक्षुओं को अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न देशों में भेजा जैसे कि तिबेट, चीन, जापान आदि। ये भिक्षु अपने साथ मंडला चित्रों को भी ले गये जिन्हें वे ध्यानधारणा जैसी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में एक उपकरण के तौर पर उपयोग में लाते थे। मंडला चित्र की रचना और अर्थ  मंडला चित्र एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक उपकरण है। भारत में सभी धर्मों के लोग जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और शिनटोई; मंडला चित्रकला का उपयोग ध्यान ...

पिछवाई चित्रकला

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                                        This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 2.5 Generic  license. 400 वर्ष पूर्व उदयपुर से 50 km दूर राजसमन्द जिले में स्थित नाथद्धारा में वल्लभ संप्रदाय से संबंधित  चित्रकला की शुरुआत हुई जिसे हम नाथद्वारा चित्रकला के तौर पर जानते हैं। नाथद्वारा चित्रकला का प्रमुख हिस्सा है पिछवाई चित्रकला। पिछवाई का अर्थ  पिछवाई अर्थात पिछेवाली। ये चित्र श्रीनाथ जी के मंदिर में मूर्तियों के पिछे टंगे हुए होते हैं अतः आकार में बहुत बडे होते हैं। ये चित्र आमतौर पर कपड़े पर बनायें जाते हैं और इनमें श्रीनाथ जी यानि श्रीकृष्ण का चित्रण होता है। पिछवाई चित्र मंदिर की भव्यता तो बढ़ते हि हैं साथ ही दर्शकों को श्रीनाथ जी के जीवन और चरित्र से परिचित कराते हैं। पिछवाईयों में श्रीकृष्ण की माखनचोरी, रासलीला, गोवर्धन प्रसंग, चीरलीला आदि प्रसंगों को नयनाभिराम रंगों में चित्रित किया जाता है। पिछवाई का एक लोकप्रिय विषय है, '...

मुगल लघुचित्र शैली

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                                       This file is licensed under the  Creative Commons  Attribution-Share Alike  4.0 International ,  3.0 Unported ,  2.5 Generic ,  2.0 Generic  and  1.0 Generic  license. लघु चित्रकारी की उत्पत्ति आठवीं शताब्दी में भारत के पूर्वी भाग में पाल शासकों के कार्यकाल के दौरान हुई।  समय के साथ साथ लघुचित्रों की कई शैलियाँ विकसित हुई जिन्हें हम लघुचित्रों के विद्यालय (school) कहते हैं। जैसे पाल शैली, जैन शैली, मुगल शैली, राजस्थानी शैली, ओडिशा शैली और पहाड़ी शैली।  ये शैलियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हैं। लघुचित्रों की ये सारी शैलियाँ एक दूसरे से प्रभावित होते हुए भी अपनी अपनी अलग विशेषताओं को संजोये हुए हैं।  इन सभी कालखंडों में मुगल शासकों के कार्यकाल को लघु चित्रकारी के लिये स्वर्णिम काल माना जाता है क्योंकि इस दौरान लघु चित...

लघु चित्रकारी

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                                        लघुचित्रकला  This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution 3.0 Unported  license. https://en.wikipedia.org/wiki/en:Creative_Commons लघु चित्रकारी भारतीय शास्त्रीय परंपरा के अनुसार बनाई जानेवाली वह कला है जिसकी विशेषता है बारीकी से की हुई जटिल चित्रकारी। लघुचित्रों की दुनिया इतिहास, धर्मग्रंथों और समय के साथ बदलते हुए लोकजीवन का समग्र दर्शन है। सामग्री और प्रक्रिया  जैसा नाम से समझ आ रहा है, ये चित्र आकार में बहुत बडे नहीं होते। लघुचित्र विशेष रूप से पुस्तकों एवं एल्बमों के लिए छोटे स्वरूप में बनायें जाते हैं। इन्हें कपड़े और कागज़ पर भी बनाया जाता है। लघुचित्रों में बहुत जटिल चित्रों को अत्यंत बारीकी से बनाना होता है अतः इसके लिए प्रयुक्त ब्रश एकदम बढ़िया किस्म के होते है जो गिलहरी के बालों से बनें होते हैं।  लघुचित्रों में प्रयुक्त रंग विभिन्न नैसर्गिक स्त्रोतों जैसे फूल, पत्ते, सब्जियां, नील, कीमती प...

तंजावुर चित्रकला

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                                         This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 4.0 International  license. तंजावुर चित्रकला दक्षिण भारत की पारंपरिक चित्रकला है जिसका मूल तंजावुर शहर में है। तंजावुर चित्रकला का इतिहास  भारतीय चित्रकला के इतिहास में तंजावुर चित्रकला का अलग स्थान है। सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में 'राया' राजवंश के शासनकालमें नृत्य, संगीत, साहित्य आदि के साथ साथ तंजावुर चित्रकला को भी बढावा दिया गया। विजयनगर रायाओं के आधिपत्य में आनेवाले सभी नायकों ने अपने अपने क्षेत्रके मंदिरों की दिवारों पर तंजावुर शैली के चित्र बनवाये और चित्रकारों को राजाश्रय दिया। विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद इन सारे चित्रकारों को आसपास के प्रदेशों में आश्रय लेना पडा। इन चित्रकारों को राजाश्रय देने के लिए तंजावुर के भोसले घराने के मराठा शासक अग्रगण्य थे। तंजावुर चित्रकला के विषय  तंजावुर चित्रकला की शुरुआत मंदिरों में होने...