लघु चित्रकारी

लघुचित्रकला

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लघु चित्रकारी भारतीय शास्त्रीय परंपरा के अनुसार बनाई जानेवाली वह कला है जिसकी विशेषता है बारीकी से की हुई जटिल चित्रकारी। लघुचित्रों की दुनिया इतिहास, धर्मग्रंथों और समय के साथ बदलते हुए लोकजीवन का समग्र दर्शन है।
सामग्री और प्रक्रिया
जैसा नाम से समझ आ रहा है, ये चित्र आकार में बहुत बडे नहीं होते। लघुचित्र विशेष रूप से पुस्तकों एवं एल्बमों के लिए छोटे स्वरूप में बनायें जाते हैं। इन्हें कपड़े और कागज़ पर भी बनाया जाता है। लघुचित्रों में बहुत जटिल चित्रों को अत्यंत बारीकी से बनाना होता है अतः इसके लिए प्रयुक्त ब्रश एकदम बढ़िया किस्म के होते है जो गिलहरी के बालों से बनें होते हैं। लघुचित्रों में प्रयुक्त रंग विभिन्न नैसर्गिक स्त्रोतों जैसे फूल, पत्ते, सब्जियां, नील, कीमती पत्थर, सोना, चांदी आदि से प्राप्त होते हैं।
कागज़ या कपड़े पर खडिया मिट्टी की चार पाँच परते चढाकर, उन्हें सूखने पर रगडकर समतल किया जाता है। चित्र बनाते समय सर्वप्रथम पृष्ठभूमि को चित्रित किया जाता है। उसके बाद पोशाक और अंत में आभूषणों एवं चेहरे सहित अन्य अंगों की रचना की जाती है। पूर्ण कलाकृति चित्रांकित होने के बाद रंग भरे जाते हैं। आभूषणों के लिए सोने और चांदी के रंग प्रयुक्त होते है साथ ही प्राकृतिक पत्थर जैसे मूँगा, लाजवर्त आदि का प्रयोग भी किया जाता है।
उत्पत्ति और विकास
ईसवी सन 750 के आसपास भारत में लघु चित्रकारी की उत्पत्ति हुई जब भारत के पूर्वी भाग पर पालों का शासन था। समय के साथ साथ लघुचित्रों की कई शैलियाँ विकसित हुई जिन्हें हम लघुचित्रों के विद्यालय (school) कहते हैं। ये शैलियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हैं। लघुचित्रों की ये सारी शैलियाँ एक दूसरे से प्रभावित होते हुए भी अपनी अपनी अलग विशेषताओं को संजोये हुए हैं।
लघुचित्रों की विभिन्न शैलियाँ
- पाल लघुचित्र शैली: आठवीं शताब्दी में भारत के पूर्वी भाग में पाल शासकों के कार्यकाल में लघु चित्रकारी का उदय हुआ। पाल शैली की लघुचित्रों के विषय बौद्ध धर्म से जुड़े हुए होते हैं। ताड़ के पत्तों पर महायान बौद्ध रूपों का और बौद्ध तांत्रिक अनुष्ठानों का चित्रण होता था।नालंदा, सोमपुरा, महाविहार, ओदंतपुरी, विक्रमशिला आदि जगहों के बौद्ध मठों में इन चित्रों का प्रदर्शन किया जाता था। जिन स्थानों पर बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ जैसे श्रीलंका, नेपाल, बर्मा (म्यान्मार), तिब्बत आदि स्थानों पर पाल लघुचित्र शैली लोकप्रिय हुई।
- जैन लघुचित्र शैली: भारत में जैन शैली की लघु चित्रकारी ने ग्यारहवीं शताब्दी ईसवी में तब प्रसिद्धि प्राप्त की जब कल्पसूत्र और कालकाचार्य कथा जैसे धार्मिक ग्रंथों को लघुचित्रों के रूप में चित्रित किया गया। ग्यारहवीं से सोलहवीं शताब्दी ईसवी तक राजस्थान, गुजरात और मालवा क्षेत्रों में जैन शैली की लघु चित्रकारी प्रचलित थी।
- मुगल लघुचित्र शैली: सोलहवीं शताब्दी में मुगल शासकों के कार्यकाल के दौरान लघु चित्रकारी को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। भारतीय चित्रकला के साथ फारसी परंपरागत तत्वों के मिश्रण से मुगल शैली का उदय हुआ। मुगल शैली के चित्रों में अधिकतर शाही महल के जीवन, बादशाहों के राजसी ठाट-बाट का चित्रांकन है। मुगल शैली में बने हुये लघुचित्रों के कई अल्बम उपलब्ध हैं। अल्बम 'रागमाला' में संगीत के पैतीस राग रागिनियों का चित्रांकन है। सभी मुगल शासक, उनकी बेगमें और सरदारों के लघुचित्र भी उपलब्ध हैं।
- राजस्थानी लघुचित्र शैली: मुगल बादशाह औरंगजेब के कार्यकाल में मुगल शासन में सभी कलाओं को मिला हुआ संरक्षण कम होने के कारण कलाओं का -हास हुआ और कलाकारों की स्थिति गंभीर हो गई। इस तत्थ्य से लघुचित्र बनाने वाले चित्रकार भी प्रभावित हुए और वे आसपास के कलाप्रेमी राजपूत शासकों के संरक्षण में चलें गये। अतः मुगल शैली के लघु चित्रकारी पर राजस्थानी शासकों के रहन सहन और समाज जीवन के प्रभाव से राजस्थानी लघुचित्र शैली का उद्भव हुआ। जहाँ मुगल शैली में शाही जीवन का चित्रांकन होता था वही राजस्थानी शैली में बालकृष्ण, राधाकृष्ण और अन्य धार्मिक विषयों पर लघुचित्र बनें। क्षेत्र के आधार पर राजस्थानी लघुचित्र शैली का विभाजन विभिन्न विद्यालयों में किया जाता है जैसे मेवाड़, मारवाड़, हैडोटी और धुंदर।
- ओडिसा लघुचित्र शैली: लघु चित्रकारी की ओडिसा शैली सत्रहवीं शताब्दी के दौरान अस्तित्व में आई थी। हालांकि सत्रहवीं शताब्दी में भारत में कागज का उपयोग व्यापक रूप से होता था परंतु लघु चित्रकारी की ओडिसा शैली का अवलंब करनेवाले चित्रकारों ने अपनी चित्रकला को ताड़ के पत्तों पर हीं प्रस्तुत करना बरकरार रखा। बाद में छायांकन और परिप्रेक्ष्य जैसी यूरोपियन तकनीकों का भी प्रयोग किया गया।
- पहाड़ी लघुचित्र शैली: लघु चित्रकारी की पहाड़ी शैली की उत्पत्ति उत्तर भारत के हिमालयीन क्षेत्रों में हुई। पहाड़ी शैली का विकास सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान हुआ। पहाड़ी शैली पर मुगल और राजस्थानी दोनों ही शैलियों का प्रभाव दिखता है। पहाड़ी शैली को भी क्षेत्र के आधार पर विभिन्न शैलियोंमें विभाजित किया जाता है जैसे गूलर, बसोहली, गढवाल, चंबा, कांगड़ा और कुल्लू।
कई सारे लघुचित्र संग्रहालयोंऔर प्राचीन राजस्थानी किलों में पायें जाते हैं। आज भी कई चित्रकार रेशम, सूती कपड़े, कागज़, हाथीदांत और अन्य सजावटी सामान पर लघुचित्र बनाते हैं। प्राकृतिक रंगोंका स्थान कृत्रिम रंगों ने ले लिया है। लघु चित्रकारी के स्कूलों का व्यापारीकरण हो गया है। वर्तमान में चित्रकार अधिकतर पुराने चित्रकारों द्वारा बनायें चित्रों की पुनरावृत्ति करते पाये जाते है।
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Yeh painting bahut sundar hai aur bahut tough bhi hai mere hisaab se isko banane mein mehnat hota jisne bhi banaya hai patience se banaya hai.God bless and all the best.
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