मुगल लघुचित्र शैली

                                      

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लघु चित्रकारी की उत्पत्ति आठवीं शताब्दी में भारत के पूर्वी भाग में पाल शासकों के कार्यकाल के दौरान हुई। समय के साथ साथ लघुचित्रों की कई शैलियाँ विकसित हुई जिन्हें हम लघुचित्रों के विद्यालय (school) कहते हैं। जैसे पाल शैली, जैन शैली, मुगल शैली, राजस्थानी शैली, ओडिशा शैली और पहाड़ी शैली। ये शैलियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हैं। लघुचित्रों की ये सारी शैलियाँ एक दूसरे से प्रभावित होते हुए भी अपनी अपनी अलग विशेषताओं को संजोये हुए हैं। 

इन सभी कालखंडों में मुगल शासकों के कार्यकाल को लघु चित्रकारी के लिये स्वर्णिम काल माना जाता है क्योंकि इस दौरान लघु चित्रकारी का सर्वाधिक विकास हुआ था। ईसवी सन 1526-1757 इस कालखंड में मुगल शासकों के राजाश्रय में चित्रकला की कई कार्यशालाओं का निर्माण हुआ। मुगल शैली के चित्रों में अधिकतर शाही महल के जीवन,  बादशाहों के राजसी ठाट-बाट का चित्रांकन है। मुगल शैली में बने हुये लघुचित्रों के कई अल्बम उपलब्ध हैं। अल्बम 'रागमाला' में संगीत के पैतीस राग रागिनियों का चित्रांकन है। सभी मुगल शासक, उनकी बेगमें और सरदारों के लघुचित्र भी उपलब्ध हैं।

मुगल लघुचित्र शैली की विशेषताएँ  

1. स्थानिक भारतीय चित्रकारों की शैली के साथ पर्शियन और इस्लामिक शैली के अनुपम संगम से लघुचित्रकला की मुगल शैली का उदय हुआ अतः पर्शियन चित्रकला का असर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

2. मुगल शैली के चित्रों में प्रकृति का अत्यंत सूक्ष्म रूप से चित्रांकन किया जाता था और ये चित्र कलात्मक दृष्टि से उच्च स्तर के थे।

3. मुगल शैली के चित्र धर्मनिरपेक्ष होते थे। चित्रों में धार्मिक विषयों को स्थान नही था।

4. आरंभिक चरण में चित्रकला केवल अभिजात और राजसी वर्ग के लिए संरक्षित थी। सामान्य जनता में इसका प्रचलन नही था।

5. चित्रों में मुगल शासकों का महिमामंडन करने के लिए उनके राजदरबार, ऐतिहासिक घटनाएँ एवं शिकार का चित्रांकन होता था।

6. चित्रों के चारों ओर के किनारों पर आलंकारिक रूप से लिखें हुए सुलेख चिन्हित होते थे।

विभिन्न मुगल शासकों द्वारा विकास के प्रयास 

भारत में मुगल शैली की लघुचित्रकला की शुरुआत 1526-30 के दौरान बादशाह बाबर के शासनकाल में हुई ऐसा माना जाता है। बाबर ने फ़ारसी चित्रकार बिहजाद को अपने संरक्षण में रखा था।

बाबर का पोता अकबर चित्रकला को अध्ययन और मनोरंजन का साधन मानता था। उसने चित्रकला और अपने दस्तावेजों के सुलेखन के लिए 'तस्वीरखाना' नामक एक स्वतंत्र विभाग स्थापित किया था जहाँ कलाकारों को वेतन देकर रखा गया। 'तूतीनामा' और 'हमजानामा' ये दो लघुचित्रों के ऐसे प्रसिद्ध संग्रह है जिन्हें अकबर के कार्यकाल में बनाया गया। तूतीनामा में करीब  52 कहानियों को 250 लघुचित्रों के द्वारा दर्शाया गया है। हमज़ानामा जिसे 'दास्तान-ए-अमीर-हमज़ा' के नाम से भी जाना जाता है, ग़ालिब लखनवी द्वारा लिखित पाण्डुलिपि है जिसमें करीब 1200 चित्रों का संग्रह है। हमज़ानामा में लाल, निले, काले, कासनी और पीले रंग के छापें मिलते हैं तथा यह मुगल लघुचित्र शैली में चित्रित सबसे प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चित्रों का संग्रह है।

बादशाह अकबर के बेटे बादशाह जहांगीर के शासनकाल में मुगल लघुचित्र शैली अपने परमोच्च स्थान पर थी। जहांगीर स्वभाव से प्रकृतिवादी था अतः पशु-पक्षियों, वृक्षों, फूलों आदि के चित्रों को प्राथमिकता देता था। उसने छविचित्रों मे प्रकृतिवाद को समाविष्ट करने  का भरसक  प्रयास किया। चित्रों के चारों ओर अलंकृत किनारे बनाने का चलन इसी कालावधि में आरंभ हुआ। जहांगीर स्वयं भी एक उत्कृष्ट चित्रकार थे और उनकी निजी चित्रशाला भी थी। उनके द्वारा बनायें गये लघुचित्रों में, झेबरा, शतुर्मुग और मुर्गे के चित्र अधिक प्रसिद्ध हैं। जहांगीर के काल के सबसे प्रसिद्ध कलाकार थे उस्ताद मंसुर जिन्हें व्यक्तिचित्रों का विशेषज्ञ माना जाता है। उस्ताद मंसुर कठिनतम चेहरे को बखूबी बना लेते थे। अयार-ए-दानिश नामक पुस्तक जहांगीर के शासनकाल में लिखी गयी थी जिसमें सुलेखन और चित्रकारी के उत्तम नमूने देखने को मिलते हैं।

जहांगीर का बेटा शाहजहाँ, अपने पिता से एकदम अलग, चित्रकला में कृत्रिम तत्वों को प्रयुक्त करने पर बल देता था और यूरोपियन शैली से प्रभावित था। उसने आरेखन के लिए लकड़ी के कोयले के स्थान पर पेंसिल का उपयोग करने के लिए कलाकारों को प्रोत्साहन दिया। वह चमकिला प्रभाव अधिक पसंद करता था अतः उसने चित्रों में सोने और चांदी का प्रयोग करने के आदेश दिए। शाहजहाँ के कार्यकाल में मुगल लघुचित्र शैली का विस्तार होने के साथ-साथ तकनीक में कईं परिवर्तन भी आये।

शाहजहाँ के बाद बादशाह होनेवाला उसका बेटा औरंगजेब सभी कलाओं का द्वेष करता था अतः अन्य सभी कलाओं के साथ-साथ लघुचित्रकला की गतिविधियों पर भी पाबंदियाँ लगाई गई। चित्रकारों को संरक्षण एवं वेतन की सुविधा समाप्त की गई। कई कलाकारों को देश के बाहर निकाला गया। इसप्रकार मुगल लघुचित्र शैली का -हास होता गया और वह समाप्ति के कगार पर पहुँची।

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