तंजावुर चित्रकला


                                        
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तंजावुर चित्रकला दक्षिण भारत की पारंपरिक चित्रकला है जिसका मूल तंजावुर शहर में है।

तंजावुर चित्रकला का इतिहास 

भारतीय चित्रकला के इतिहास में तंजावुर चित्रकला का अलग स्थान है। सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में 'राया' राजवंश के शासनकालमें नृत्य, संगीत, साहित्य आदि के साथ साथ तंजावुर चित्रकला को भी बढावा दिया गया। विजयनगर रायाओं के आधिपत्य में आनेवाले सभी नायकों ने अपने अपने क्षेत्रके मंदिरों की दिवारों पर तंजावुर शैली के चित्र बनवाये और चित्रकारों को राजाश्रय दिया। विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद इन सारे चित्रकारों को आसपास के प्रदेशों में आश्रय लेना पडा। इन चित्रकारों को राजाश्रय देने के लिए तंजावुर के भोसले घराने के मराठा शासक अग्रगण्य थे।

तंजावुर चित्रकला के विषय 

तंजावुर चित्रकला की शुरुआत मंदिरों में होने के कारण तंजावुर चित्रकला के विषय हिंदू धर्म से जुड़े होते है जैसे बालाजी, महालक्ष्मी, श्री गणेश, बालकृष्ण, राधाकृष्ण आदि। तंजावुर चित्रकला समय-समय पर विभिन्न शासकों के आधिपत्य में विकसित होने के कारण इस पर दक्खिनी, विजयनगर, मराठा यहाँ तक कि यूरोपियन कंपनी शैली की चित्रकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कई स्थानों पर जैन, सिक्ख (गुरू भाई बाला और भाई मरदाना का चित्र),  मुस्लिम तथा अन्य धर्मों से संबंधित चित्र भी उपलब्ध हैं। कई शासकों ने स्वयं के चित्र भी तंजावुर शैली में बनवाये जैसे राजे सरफोजी द्वितीय, साराभोजी राजे आदि। सामाजिक विषयों पर बने चित्रों में मुगल दरबार, सुट्टी (छुट्टी के लिए मराठी शब्द)    और तंजावुर की नर्तकी यह चित्र प्रमुख हैं।

तंजावुर चित्रोंकी विशेषताएँ

सुंदर, मनमोहक और उठावदार रंग, सरल संरचना,  3D प्रभाव और सोने का वर्ख यानि गोल्डन फाॅईल का इस्तेमाल ये तंजावुर चित्रकला की विशेषताएँ है। 

लकडी के तख्ते या लकडी और कपड़े से बने कैनवास पर चित्र बनायें जाते हैं।  इसलिए इसे पैनल पेंटिंग भी कहते हैं। दिवारों और छतों पर भी तंजावुर चित्रकला की जाती है। उभरा हुआ 3 डी प्रभाव दिखाने के लिए चित्रकार ग्लू गैसो या इटालियन गैसो का प्रयोग होता है। गैसो, प्राणीजन्य गोंद(जिसे सुक्कन या मक्कू भी कहते है और जो ज्यादातर  खरगोश से प्राप्त होता है) और चूना पावडर का एक पारंपरिक मिश्रण है जो सफेद रंग का होता है। चित्र  में जिस हिस्से को उभरा हुआ दिखाना है उन हिस्सों पर ग्लू गैसो की मोटी परत दे कर उपर सोने का वर्ख चिपकाया जाता है। चित्र में गहने भी 3D प्रभाव से बनाकर सोने का वर्ख चिपकाया जाता है। चित्र के अन्य रंग भी मनमोहक और उठावदार होते हैं। ज्यादातर गहरे लाल, हरा, निला, पिला ये रंग प्रयुक्त होते है। पहले सभी प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था। आजकल कृत्रिम रंगों का भी प्रयोग होता है। किमती पत्थर, जवाहरात और काँच के टुकड़ों से चित्र को सुशोभित किया जाता है। तंजावुर चित्रों की संरचना अत्यंत सरल होती है। चित्र के मुख्य विषय को मध्यभाग में बनाकर चारों ओर की चीजें जैसे मंडप, परदे, स्तंभ आदि  उभरी हुई और सोने के वर्ख से सजी हुई होती हैं। तंजावुर शैली के चित्रों में गोलाकार चेहरे, बादाम के आकार की बड़ी आँखें और दुबली-पतली परंतु सुन्दर देहयष्टि चित्रांकित की जाती है।

तंजावुर शैली के कांच चित्र 

तंजावुर चित्रकला शैली में कांच की सतह पर बने हुए चित्र भी उपलब्ध हैं। इन चित्रों को बनाने के लिए चीनी रिवर्स ग्लास पेंटिंग की तकनीकों का उपयोग किया गया। तंजावुर कांच चित्रों को एक सस्ते और तेज शिल्प के रूप में मराठा शासक राजे सर्फोजी द्वितीय के शासनकाल के दौरान लोकप्रिय बनाया गया था।  आभूषण और कीमती पत्थरों के प्रभाव को दिखाने के लिए कांच की शीट की पिछली सतह पर धातु की पट्टियों को विशिष्ट अंतराल में लगाया गया था। 

पारंपरिक शास्त्रीय तंजावुर चित्रकला मे 22 कैरेट सोने के वर्ख का उपयोग होने के कारण इन चित्रों की कीमत लगभग दस हजार रुपये से शुरू होती है। इस कीमत को कम करने के लिए इमिटेशन गोल्ड फाॅईल का उपयोग होता है। तंजावुर चित्र की खरेदी करते समय हमें 'सर्टिफिकेट ऑफ ऑथेन्टिसिटी फाॅर गोल्ड फाॅईल' की मांग करनी चाहिए ताकि कोई धोखा होने की संभावना न रहे।

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