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मंडला चित्रकला

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                                    तिबेटियन मंडला     मंडला चित्रकला का इतिहास  एशियाई आध्यात्मिक चित्रकला का अध्ययन करते समय हमें मंडला का परिचय मिलता है। मंडला चित्रकला का उल्लेख सर्वप्रथम बुद्ध धम्म संबंधित साहित्य में मिलता है।  ज्ञानप्राप्ति के बाद महात्मा गौतम बुद्ध अपने तत्वज्ञान का प्रचार करने के लिए उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में घूम घूम कर  प्रवचन देते थे जिससे उनके कई शिष्य बन गये। शिष्यों की संख्या बढने पर उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की और इन भिक्षुओं को अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न देशों में भेजा जैसे कि तिबेट, चीन, जापान आदि। ये भिक्षु अपने साथ मंडला चित्रों को भी ले गये जिन्हें वे ध्यानधारणा जैसी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में एक उपकरण के तौर पर उपयोग में लाते थे। मंडला चित्र की रचना और अर्थ  मंडला चित्र एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक उपकरण है। भारत में सभी धर्मों के लोग जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और शिनटोई; मंडला चित्रकला का उपयोग ध्यान ...

पिछवाई चित्रकला

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                                        This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 2.5 Generic  license. 400 वर्ष पूर्व उदयपुर से 50 km दूर राजसमन्द जिले में स्थित नाथद्धारा में वल्लभ संप्रदाय से संबंधित  चित्रकला की शुरुआत हुई जिसे हम नाथद्वारा चित्रकला के तौर पर जानते हैं। नाथद्वारा चित्रकला का प्रमुख हिस्सा है पिछवाई चित्रकला। पिछवाई का अर्थ  पिछवाई अर्थात पिछेवाली। ये चित्र श्रीनाथ जी के मंदिर में मूर्तियों के पिछे टंगे हुए होते हैं अतः आकार में बहुत बडे होते हैं। ये चित्र आमतौर पर कपड़े पर बनायें जाते हैं और इनमें श्रीनाथ जी यानि श्रीकृष्ण का चित्रण होता है। पिछवाई चित्र मंदिर की भव्यता तो बढ़ते हि हैं साथ ही दर्शकों को श्रीनाथ जी के जीवन और चरित्र से परिचित कराते हैं। पिछवाईयों में श्रीकृष्ण की माखनचोरी, रासलीला, गोवर्धन प्रसंग, चीरलीला आदि प्रसंगों को नयनाभिराम रंगों में चित्रित किया जाता है। पिछवाई का एक लोकप्रिय विषय है, '...

मुगल लघुचित्र शैली

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                                       This file is licensed under the  Creative Commons  Attribution-Share Alike  4.0 International ,  3.0 Unported ,  2.5 Generic ,  2.0 Generic  and  1.0 Generic  license. लघु चित्रकारी की उत्पत्ति आठवीं शताब्दी में भारत के पूर्वी भाग में पाल शासकों के कार्यकाल के दौरान हुई।  समय के साथ साथ लघुचित्रों की कई शैलियाँ विकसित हुई जिन्हें हम लघुचित्रों के विद्यालय (school) कहते हैं। जैसे पाल शैली, जैन शैली, मुगल शैली, राजस्थानी शैली, ओडिशा शैली और पहाड़ी शैली।  ये शैलियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हैं। लघुचित्रों की ये सारी शैलियाँ एक दूसरे से प्रभावित होते हुए भी अपनी अपनी अलग विशेषताओं को संजोये हुए हैं।  इन सभी कालखंडों में मुगल शासकों के कार्यकाल को लघु चित्रकारी के लिये स्वर्णिम काल माना जाता है क्योंकि इस दौरान लघु चित...

लघु चित्रकारी

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                                        लघुचित्रकला  This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution 3.0 Unported  license. https://en.wikipedia.org/wiki/en:Creative_Commons लघु चित्रकारी भारतीय शास्त्रीय परंपरा के अनुसार बनाई जानेवाली वह कला है जिसकी विशेषता है बारीकी से की हुई जटिल चित्रकारी। लघुचित्रों की दुनिया इतिहास, धर्मग्रंथों और समय के साथ बदलते हुए लोकजीवन का समग्र दर्शन है। सामग्री और प्रक्रिया  जैसा नाम से समझ आ रहा है, ये चित्र आकार में बहुत बडे नहीं होते। लघुचित्र विशेष रूप से पुस्तकों एवं एल्बमों के लिए छोटे स्वरूप में बनायें जाते हैं। इन्हें कपड़े और कागज़ पर भी बनाया जाता है। लघुचित्रों में बहुत जटिल चित्रों को अत्यंत बारीकी से बनाना होता है अतः इसके लिए प्रयुक्त ब्रश एकदम बढ़िया किस्म के होते है जो गिलहरी के बालों से बनें होते हैं।  लघुचित्रों में प्रयुक्त रंग विभिन्न नैसर्गिक स्त्रोतों जैसे फूल, पत्ते, सब्जियां, नील, कीमती प...

तंजावुर चित्रकला

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                                         This file is licensed under the  Creative Commons   Attribution-Share Alike 4.0 International  license. तंजावुर चित्रकला दक्षिण भारत की पारंपरिक चित्रकला है जिसका मूल तंजावुर शहर में है। तंजावुर चित्रकला का इतिहास  भारतीय चित्रकला के इतिहास में तंजावुर चित्रकला का अलग स्थान है। सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में 'राया' राजवंश के शासनकालमें नृत्य, संगीत, साहित्य आदि के साथ साथ तंजावुर चित्रकला को भी बढावा दिया गया। विजयनगर रायाओं के आधिपत्य में आनेवाले सभी नायकों ने अपने अपने क्षेत्रके मंदिरों की दिवारों पर तंजावुर शैली के चित्र बनवाये और चित्रकारों को राजाश्रय दिया। विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद इन सारे चित्रकारों को आसपास के प्रदेशों में आश्रय लेना पडा। इन चित्रकारों को राजाश्रय देने के लिए तंजावुर के भोसले घराने के मराठा शासक अग्रगण्य थे। तंजावुर चित्रकला के विषय  तंजावुर चित्रकला की शुरुआत मंदिरों में होने...

कलमकारी चित्रकला

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कलमकारी अर्थात कलम से की जानेवाली कलाकारी। कलमकारी की कला ईरान के ईस्फाहान प्रांत और भारत के आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य की पहचान है।  कपड़े और रंगों की तैयारी:  सूती कपड़े पर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनायें जाते हैं। कपडे को दूध और माँड के घोल में डुबोकर रातभर रखा जाता है। दूसरे दिन धूपमें अच्छी तरह से सुखाकर लकडी के दस्ते से कूट कर नरम किया जाता है। इसतरह तैयार किया गया कपड़ा प्राकृतिक रंगों को अच्छी तरह से सोंखने में सक्षम होता है। पौधों, पत्तों, पेड़ों की छाल, तनों आदि का उपयोग करके प्राकृतिक रंग बनायें जाते हैं। दूध की गंध को दूर करने के लिए हरड़  का प्रयोग होता है। हरड़ और फिटकरी के प्रयोग से रंगों की स्थिरता को भी सुनिश्चित किया जाता है। कलमकारी के विषय: भारत में कलमकारी चित्रकला के विषय पौराणिक कथाओं एवं उनके चरित्रों के  साथ जुड़े होते हैं जैसे राधाकृष्ण, मत्स्यावतार, कृष्णलीला, रामदरबार, गीतोपदेश, दशावतार, पंचमुखी हनुमान, गणेश, सरस्वती, स्वस्तिक, पुष्पक विमान आदि। बुद्ध और बौद्ध कला रूपों का चित्रांकन भी होता हैं। आजकल फूल, छोटे जानवर, वाद्ययंत्र, बैल, म...

पट्टचित्र कला

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                                              पट्टचित्र श्रीमती नीता परिहार के सौजन्य से  पट्टचित्र ओडिशा और पश्चिम बंगाल की नयनरम्य पारंपरिक चित्रकला है जो कपड़े पर या ताड़ के पत्तों को जोड़ कर उसपर की जाती है। प्राचीन काल में इसे राजाओं महाराजाओं का संरक्षण प्राप्त था। पंद्रहवीं, सोलहवीं शताब्दी में जगन्नाथजी का प्रचार करने के हेतु से पट्टचित्रों का विकास जात्री चित्रों के रूप में हुआ। जात्री चित्र: रथयात्रा में जगन्नाथ जी के दर्शन करने आने वाले भाविकों को जात्री कहते हैं। ये भक्त घर जाते समय इन चित्रों को खरीद कर ले जाते थे ताकि जो नही आ पाये उन्हें भी जगन्नाथ जी का दर्शन हो सके।ये जात्रीचित्र अपने आकारों के अनुसार तीन तरह के होते हैं। टिकली और पदक: यह कपड़े पर बनाये जाते थे और इनका आकार एक इंच या उससे भी कम होता था। एक बडे कपड़े पर बहुत सारे गोलाकार या आयताकार बनाकर उनमें जगन्नाथ जी या सुभद्रा, बलराम और जगन्नाथ जी के चित्रों को बनाकर उन्हें काटकर अलग कर दिया जात...