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मधुबनी चित्रकला

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Madhubani painting on kurta by Smt Rajni Jha   Madhubani painting on saree by Smt Rajni Jha विभिन्न भारतीय पारंपरिक लोककलाओं  में से एक 'मधुबनी चित्रकला'  जिसे मिथिला चित्रकला के नाम से भी जाना जाता है, आज लोकप्रियताके चरम पर है। महिलाओं द्वारा परिधान किये जानेवाली साडियाँ एवं कुरतों के द्वारा मधुबनी चित्रकला भारत के घर घर में पहुँच रही है साथ ही विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ रही है। मधुबनी चित्रकला बिहार के मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। माना जाता है कि ये चित्र राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के दौरान महिलाओं से बनवाये थे। आरंभ में मधुबनी चित्रकला केवल महिलाओं द्वारा हि की जाती थी। धीरे धीरे पुरूष भी इसमें सहभागी हुए।  इसमें देवी-देवताओं के चित्र, प्राकृतिक दृश्य, पेड़ पौधें और विवाह के दृश्य आदि का चित्रण होता है। मधुबनी चित्रकला में प्रयुक्त रंग घरेलू वस्तुओं से बनायें जाते हैं। जैसे हल्दी, केले के पत्ते, लाल रंग के लिए पिपल की छाल आदि। मधुबनी चित्रकला को घर की खास तीन जगहों पर बनाने की परंपरा है जैसे पू...

नांगेली, एक विस्मृत नायिका

आठ मार्च का दिन विश्व के लगभग सभी देश महिला दिवस के रूप में मनाते है। कुछ देश जैसे बुल्गारिया और रोमानिया में यह दिन मातृदिवस के रूप में मनाया जाता है। आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजकिय  क्षेत्रों में प्राप्त  उपलब्धियों का सम्मान करना है ताकि अन्य महिलाएं उनसे प्रेरणा लेकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।  आज महिलाओं की सामाजिक स्थिति को देखते हुए हम यह अवश्य हि कह सकते है कि आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का उद्देश्य सफल हुआ है क्योंकि ऐसी असंख्य महिलाएँ हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त की है। इन असंख्य यशोगाथाओं के साथ साथ कुछ ऐसी विस्मृत कहानियाँ भी हैं जिनकी नायिकाएँ अपने जीवन में यशस्वी भले ही ना हो पाई लेकिन उनका जीवन संघर्ष किसी यशस्वी नायिका के संघर्ष से कम नही था। उनके द्वारा उठाये गये एक साहसिक कदम ने महिला उत्थान के कठिनतम आंदोलन को बल प्रदान किया। ऐसी ही एक विस्मृत नायिका है नांगेली। बात है उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ के दिनों की जब केरल के अधिकांश हिस्सों में त्र...

महाराजा सयाजीराव गायकवाड़, एक कूटनीतिज्ञ

ब्रिटिश शासनकाल में सभी छोटे बड़े राजा महाराजा अंग्रेजों के अधीन थे। सारे अधिकार अंग्रेजी शासकों के हाथों में थे। राजाओं को निश्चित धनराशि और कुछ निजी सुविधाएँ मिलती थी और वे संतुष्ट होकर ऐशो-आराम से जीवन बिताते थे। मगर एक ऐसे भी राजा थे जिन्होंने देश में ब्रिटिश शासन के दौरान हर क्षेत्र में शानदार काम किया।  वह व्यक्ति बड़ौदा संस्थान के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ हैं। सयाजीराव की एक गरीब किसान के बेटे से एक राजा तक की यात्रा बहुत प्रेरणादायक है।  उन्होंने शिक्षा, नागरिक सुविधाएँ, संस्कृति, खेल, बैंकिंग जैसे कई क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया।  उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए भी पर्दे के पीछे से  कड़ी मेहनत की। सयाजीराव गायकवाड़ का जन्म 11 मार्च, 1863 को महाराष्ट्र के एक गरीब किसान के घर में हुआ था। उनके बचपन का नाम गोपाल था और उनके पिता का नाम काशीराव गायकवाड़ था।  गोपाल का परिवार बड़ौदा राजवंश से संबंधित था। बड़ौदा की महारानी जमनाबाई ने अपने पति महाराज खंडेराव गायकवाड़ की मृत्यु के बाद गोपाल को सिंहासन के लिए अपनाया।  राज्याभिषेक समारोह 27 मई 1875 को ...

प्रार्थना के हाथ

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  कागज़ पर लकीरें खींचने की आदत मुझे बचपन से ही थी। स्कूल और काॅलेज में पढ़ते समय सभी काॅॅॅपियों केे पिछेसे आधे पन्ने तरह तरह के फूलों और चेहरोंं से भरेे रहते थे। उम्र के करीब पैैैैंतालिस वर्ष पूूर्ण होने के बाद अपनी इस आदत की ओर थोड़ा ध्यान देने की इच्छा हुई। उसी समय पति का तबादला मुंबई हुआ। मुंबई में रहते हुए अपनी इस इच्छा को पूर्ण करने का अवसर भी मुझे मिला। मै और मेरी एक समविचारी सहेली अजिता खडके, हम दोनों ने कलानिकेतन संस्था द्वारा संचालित चित्रकला क्लास में दाखिला लिया जहाँ हमने  वारली चित्रकला की बारीकियां सिखी। बाद में नागपुर आने पर श्रीमती सुगुणा राव जैसी प्रतिभाशाली कलाकार का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। राव मॅडम ने रंग, ब्रश और कैनवास के साथ कई प्रयोग सिखाये। साथ ही उन्होंने इस बात के लिए भी प्रोत्साहित किया कि मैं नामवंत चित्रकारों के बारे में जानकारी प्राप्त करूँ और उनके चित्रों का अभ्यास करूँ। इसी अभ्यास के दौरान एक चित्र और उससे संबंधित कहानी जो मन को भा गयी वह चित्र है 'प्रार्थना के हाथ'। 'प्रार्थना के हाथ' इस चित्र को 'Study of the hands of an Apostle...

छोटे बच्चों की लेखन समस्याएँ

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                    एक ट्यूशन शिक्षिका के रूप में, मेरे पास विभिन्न विद्यालयों के कक्षा पहली से आठवीं तक के विद्यार्थी आते है। अतः विभिन्न परिस्थितियों में पले बढ़े छात्रों से मिलने के पर्याप्त अवसर मुझे मिले । मैंने बच्चों की समस्याओं को बारीकी से देखा है, हमेशा उनके माता-पिता के साथ चर्चा की और समाधान को खोजने की कोशिश की।  छोटी कक्षाओं के छात्रों के साथ एक आम समस्या यह है कि बच्चा पर्याप्त तेज़ी से लिखने में सक्षम नहीं है। उसकी लेखन में कोई गति नहीं है। क्लासवर्क और होमवर्क कभी पूरा नहीं होता है। एक और आम समस्या यह है कि लेखन स्पष्ट नहीं है। लेखन बहुत हल्का है। यह समस्या पकड़ से संबंधित है। बच्चा पेंसिल को ठीक से नहीं पकड़ रहा है इसलिए वह पर्याप्त गति से नहीं लिख पा रहा है। और बच्चा लिखते समय पर्याप्त बल लागू नहीं कर रहा है, इसलिए लेखन इतना स्पष्ट नहीं है।  बेहतर लेखन के लिए पेन या पेंसिल को उसकी नोंक से डेढ़ इंच दूर पकडना चाहिए और पकड़ कोमल लेकिन दृढ़ होनी चाहिए। हम इस समस्या से निपटने के लिए कुछ गतिविधियां कर सकते हैं। ये ...

प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका, सावित्री बाई फुले

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श्रीमती सावित्रीबाई फुले  तीन जनवरी का दिन समस्त भारतीय महिलाओं के लिए किसी त्योहार से कम नही। यह दिन सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन है जिन्हें हम भारत की प्रथम महिला शिक्षिका और एक महिला समाज सुधारक के तौर पर जानते है। इस लेख में कुछ भी नया नही। सावित्रीबाई किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जो कुछ भी मैंने पढ़ा उसे संकलित रूप में इस लेख द्वारा दोहराने का प्रयोजन मात्र इतना ही है कि उनके प्रति अपने आदरभाव को मै प्रकट कर सकूँ और श्रद्धा सुमन अर्पित कर सकूँ। प्रारंभिक जीवन  सावित्री बाई का जन्म  3 जनवरी 1831को  महाराष्ट्र के नायगाँव में पिता खण्डोजी नेवसे तथा माता लक्ष्मीबाई के घर हुआ। केवल 9 वर्ष की आयु में उनकी शादी जोतीराव फुले साथ हुई और वे पुणे आ गई। जोतीराव शादी के समय तेरह वर्ष के थे। बचपन में हि जोतीराव की माँ का देहांत हो गया था और उनका पालन पोषण बुआ सगुणाऊ ने हि किया। सगुणाऊ एक अंग्रेज अधिकारी के घर आया का काम करती थी अतः वे अंग्रेजी बोल लेती थी। हालांकि उन्हें अंग्रेजी पढना और लिखना नही आता था। सगुणाऊ ने जोतीराव को शिक्षा प्र...

कैसे छुडायें बच्चे की अंगूठा चूसने की आदत?

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मेरा एक छात्र उसका अंगूठा चूसता था। हालांकि वह दूसरी कक्षा में था फिर भी उसे अपना अंगूठा चूसने की आदत थी। मैंने उसकी मां से बात की और उसने कहा कि जब वह बड़ा हो जाएगा, तो अपने आप यह आदत छूट जायेगी। लेकिन मुझे लगता है कि वह इसे बहुत हल्के में ले रही है। देखें, यदि एक शिशु अपने अंगूठे या उंगलियों को चूस रहा है, तो आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।  केवल स्वच्छता का ठीक से ध्यान रखें।  बच्चे के हाथों को बार-बार धोएं।  जैसे-जैसे शिशु बड़ा होता है और रेंगना शुरू कर देता है , उसके हाथ अन्य गतिविधियों में व्यस्त हो जाते हैं तब बच्चा अंगूठा चूसना बंद कर देगा।  लेकिन अगर यह अंगूठा चूसने की आदत डेढ-दो वर्ष की आयु के आगे भी जारी रहती है तो यह बडी समस्या हो सकती है। पहली बात यह है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, तब अन्य बच्चों के साथ खेलते हुए और स्कूल में भी, यह अंगूठा चूसने की आदत उसके लिए शर्मनाक होगी।  यह शर्मिंदगी उसकी पढ़ाई को प्रभावित करेगी।  और जैसा कि यह आदत अस्वच्छ है अतः स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यह कुछ स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है। दूसरी बात यह...