अष्टांगिक मार्ग
मनुष्य को जीवन में दुखों का सामना करना पड़े यह बात स्वाभाविक है और जिस तरह इन दुखों का कोई कारण होता है उसी तरह उनका निवारण भी अवश्य होता है। दुखों के निवारण के लिए बुद्ध ने हमें अष्टांगिक मार्ग बताया। अष्टांगिक मार्ग को पाली भाषा में 'अरिअगिका मग्गा' कहते है और जैसा कि नाम से हि स्पष्ट है, अष्टांगिक मार्ग में आठ तत्वों का समावेश है।
धम्मचक्र
अष्टांगिक मार्ग को बौद्ध प्रतीकों में 'धम्मचक्र' के माध्यम से दर्शाया जाता है। बौद्ध प्रतीक 'धम्मचक्र' में आठ आरियाँ या तिलियाँ होती हैं। धम्मचक्र की आठ आरियाँ अष्टांगिक मार्ग के आठ तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
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| धम्मचक्र |
सम्यक् तत्वज्ञान
अष्टांगिक मार्ग को बौद्ध वाङमय में कुछ जगहों पर सम्यक् तत्वज्ञान भी कहा गया है। सम्यक् को पाली भाषा में कहते है 'संमा'। सम्यक् या संमा का अर्थ है सही। अर्थात अष्टांगिक मार्ग हमें ऐसे आठ तत्वों से या सही तरीकों से अवगत कराता है जिन्हें अपनाने से हम अपने दुखों का निवारण कर सकते है।
अष्टांगिक मार्ग में समाविष्ट आठ तत्व
- सम्यक् दृष्टि: किसी भी बात को पूर्वाग्रहरहित दृष्टि से देखना। किसी बात को लेकर यदि हम पहले से अनुमान लगाते है और उस बारे में कोई धारणा बना लेते हैं तो वह बात हमें वैसे ही दिखाई देती है जैसी हमारी धारणा है। अतः किसी भी बात को देखते समय अपनी धारणाओं को अलग रखकर जागरूकता से देखना चाहिए ताकि जो बात जैसी है वैसी ही हम देख पायें।
- सम्यक् संकल्प: जब हम हर बात को सम्यक् दृष्टि से देखते है तब हम उचित और अनुचित के अंतर को समझ पाते हैं। यदि हमें लगता हैं कि हम कुछ अनुचित कर रहे हैं तो हमें उसे बदलना होगा परंतु यह बदलाव एक दिन में तो नही आ सकता। इसलिये हमें जो उचित है उसे करने का संकल्प करना होगा और इस संकल्प को पूरा करने की दिशा में काम भी करना होगा। हमें यह बात भी ध्यान में रखनी है कि बदलना अपने आप को है। दूसरों को बदलने की हठधर्मीता नही करनी है।
- सम्यक् वचन: सम्यक् वचन का अर्थ तो यही है कि हमें जो जैसा है उसे वैसा ही बोलना है अर्थात हमें झूठ नहीं बोलना है मगर ऐसा करना अतिशय कठीण काम है। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम अपनों को नाराज़ कर सकते हैं । हमारे रिश्ते खराब हो सकते हैं। रोजगार खत्म हो सकता है। अतः सम्यक् वचन से यह अभिप्रेत है कि हमें ऐसा झूठ बोलने से बचना है जो किसी को नुकसान पहुंचाये। हमें विभाजनकारी और अपमानजनक भाषा से बचना है। यही सही भाषण यानि सम्यक् वचन कहा जाता है।
- सम्यक् कर्म: सम्यक् कर्म का अर्थ है कि जो अपने मन को सही लगे वो हि करना लेकिन इसका अर्थ स्वच्छन्दता कतई नही है। इसका अर्थ यही है कि हमें किसी के दबाव में आकर कोई काम नही करना है। कई बार ऐसा होता है कि हम जानते है कि जो कुछ हम कर रहे है वो गलत है फिर भी हम किसी दबाव में आकर उसे करते है। हर बात को सम्यक् दृष्टि से परखने के बाद यदि हमारा विवेक अनुमति दे तभी कोई कर्म करना हमारे लिए बेहतर होगा।
- सम्यक् आजीविका: सम्यक् आजीविका अर्थात अपने जिवनयापन के लिए आवश्यक कमाई अपनी मेहनत से करना। अर्थार्जन के लिए कोई भी ऐसा मार्ग नही अपनाना चाहिए जिससे किसी को नुकसान पहुंचता हो। पाँच तरह के व्यापार निषिद्ध माने गये हैं जैसे मद्य का व्यापार, मांस का व्यापार, शस्त्रों का व्यापार, विष का व्यापार और पशुओं का व्यापार।
- सम्यक् प्रयास: सम्यक् प्रयास का अर्थ है अपने सम्यक् संकल्प को पूरा करने के लिए आवश्यक सारे प्रयास सही तरीके से करना, अष्टांगिक मार्ग के तत्वोंका अभ्यास करना और मन में व्याप्त नकारात्मकता तथा अस्वस्थ मानसिक स्थिति को समाप्त करने के लिए प्रयास करना। समाज के लिए नुकसानदायक विचारों के दुष्परिणामों को सोचते हुये उन्हें दूर करना और लाभप्रद विचारों को कार्यान्वित करने के लिए प्रयास करना।
- सम्यक् स्मृति: सम्यक् स्मृति का अर्थ है सही बातों को याद रखना और व्यर्थ की बातों को भूल जाना। हम अपने साथ घटित बुरी बातों को बार-बार याद करते है। इस कारण से मन की नकारात्मकता बढती है जो हमारे अपने व्यक्तित्व के लिए हानिकारक है। अतः हमें दुखद बातों को भूलकर अच्छी बातों को याद रखना है और दोहराना है ताकि मन की सकारात्मकता बढें और हम अपने व्यक्तित्व को निखार सकें ।
- सम्यक् समाधि: समाधि का अर्थ है मानसिक शांति को पाना जिसके लिए लगातार लंबे समय तक साधना की आवश्यकता होती है। कुछ लोग तुरंत मानसिक शांति पाने के लिए नकली बाबाओं के चंगुल में फंस जाते हैं या फिर नशे के आदी हो जाते हैं जो अत्यंत नुकसानदायक हैं। सम्यक् समाधि से यह अभिप्रेत है कि हमें मानसिक शांति पाने के लिए पूर्ण बोध के साथ समाधि पाने का प्रयास करना चाहिए।
तीन स्तरीय विभाजन
अष्टांगिक मार्ग का तीन स्तरीय विभाजन भी कीया जाता है जिसे 'प्रज्ञा, शील और करूणा' के तौर पर जाना जाता है।
- सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प का अवलम्ब करके हम आत्मपरिक्षण करते हुए ज्ञान अर्थात प्रज्ञा को प्राप्त कर सकते हैं।
- सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म और सम्यक् आजीविका हमारे नैतिक गुणों को विकास करते हैं और हमारे अच्छे शील के निर्माण में सहायक हैं।
- सम्यक् प्रयास, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि हमें लाभकारी बातों पर अपने आप को केन्द्रित करने में उपयोगी हैं। हमारी यही कामना रहती है कि हम दूसरों की सहायता करे तथा किसी को हानि न पहुंचाये। अर्थात ये तीनों तत्व हमारे मन में करूणा उत्पन्न करते हैं।
परस्पर संबंध
अष्टांगिक मार्ग के आठों तत्व एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। सम्यक् दृष्टि एवं सम्यक् संकल्प हमारे व्यवहार को सही दिशा देते हैं और हमें सहजता से सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म और सम्यक् आजीविका की और ले जाते हैं जिससे हम अच्छा शील प्राप्त कर सकते हैं। इसतरह से अच्छा शील प्राप्त करने पर हम यह सम्यक् प्रयास कर सकते हैं कि हानिकारक दुखद स्मृति को भूलकर लाभप्रद सम्यक् स्मृति को संजोये और सम्यक् समाधि के माध्यम से अपने मन को कल्याणकारी बातों पर एकाग्र करते हुए मनःशांती प्राप्त कर सकें।
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Excellent. Budhdha's philosophy is explained very nicely in very simple language.
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी जानकारी व सीख 👌
जवाब देंहटाएंMind blowing blog. Feel it like reading it again and again, the eight fold path of Lord Buddha, which has been explained in your very special style of expression. Very good. Keep it up.
हटाएंThis is written in a very simple language.This eightfold path of Buddha shows the right path to lead peaceful righteous life and gain power to fight against negative thoughts , circumstances and actions.Lord Buddha told this,Four noble truths and the wheel of life to his five contemporary ascetics in Sarnath in the first sermon after his enlightenment in Boudh Gaya.These three things are basic things of Buddhist Everyone must study these things.Wonderful things are discovered and invented by Buddha.🙏
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