पारंपरिक भारतीय कढ़ाई के प्रकार भाग - 2
इस लेख के प्रथम भाग में हमने चिकनकारी, फुलकारी, जरदोजी, काश्मीरी कढ़ाई और कांथा कढ़ाई के बारे में जानकारी प्राप्त की थी। लेख के इस दूसरे भाग में कढ़ाई की इस सुन्दर हस्तकला के बारे में थोड़ा और जानने की कोशिश करते है।
कच्छी कढ़ाई: यह गुजरात और राजस्थान के राबारी समाज की स्त्रियों द्वारा की जाती है। राबारी एक यायावर जनजाती है। अतः इसे राबारी कढ़ाई भी कहा जाता है। इस कढ़ाई के कई प्रकार हैं जैसे मिरर वर्क, बिड्स का काम, सिंधी कढ़ाई इत्यादि। इन सभी का मिला जुला प्रयोग करके साडियाँ, चादरें,बॅग्ज,कुशन कवर आदि पर कच्छी कढ़ाई की जाती है। कच्छी कढ़ाई ने आज एक उन्नत उद्योग का रूप धारण कर लिया है और राबारी जनजाती को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में सहयोगी साबित हुई है।
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| कच्छी कढ़ाई (यह चित्र श्रीमती विजया सुंदर के सौजन्य से) |
सुजनी कढ़ाई: यह बिहार के भुसुरा गाँव में उत्पन्न एक प्राचीन कला है। अलग अलग रंग के कपड़े के टुकड़ों को एक साथ सिल दिया जाता है जिसमे देवी देवता,पशु-पक्षि,सूर्य, चंद्र,तारे आदि के चित्रोंकी कढ़ाई की जाती है और उन्हें दिवार पर लटका दिया जाता है। सुजनी कढ़ाई के टांके कांथा स्टिच जैसे हि होते हैं। बाजार की मांग के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए कलाकारों ने साड़ियों और अन्य कपड़ों पर पैटर्न बनाने शुरू किये है। सुजनी कढ़ाई को सन 2019 का युनेस्को सील ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड प्राप्त हुआ है।
| सुजनी कढ़ाई Image by Sue Reno from suereno.blogspot.com |
पिपली कढ़ाई: ओडिशा की प्रसिद्ध चंदनयात्रा में देवताओं के ऊपर जो छत्रियाँ होती है उसपर पिपली कढ़ाई की जाती है। पिपली गाँव से आने के कारण इसे पिपली कढ़ाई का नाम दिया गया। कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़ोंपर फूल, पशु, पक्षी, तथा अन्य पारंपरिक प्रतीकों को बनाया जाता है और इन टुकड़ों को एक बड़े कपड़े के आधार पर पैबंद की तरह सिला जाता है। आधार का कपड़ा और पैबंद का कपड़ा दोनों ही सूती होते हैं। आजकल पिपली कढ़ाई का उपयोग करके चादरें, कुशन कव्हरस्, हॅण्डबॅग्ज, कठपुतलियां, तकिया खोल, लैम्प शेड, दिवार की लटकन आदि बनायें जाते हैं।
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पिपली कढ़ाई
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चंबा रूमाल कढ़ाई: यह हिमाचल प्रदेश की हस्तकला है। चंबा राज्य के पूर्व शासकों द्वारा इसे बढ़ावा दिया गया। रेशम, मलमल या खद्दर के कपड़ो पर सुंदर मनभावन रंग-बिरंगे धागों से डबल सॅटिन स्टिच से ऐसे डिजाइन बनायें जाते हैं जिससे आगे और पिछले दोनों तरफ़ समानता रखी जा सके। इन वस्त्रों को मुख्यतः शादियों तथा समारोहों पर उपहार स्वरूप दिया जाता है।
कसूटी कढ़ाई: कसूटी कढ़ाई कर्नाटक राज्य की विशेषताा है।इसे धारवाड़़ी कढ़ाई भी कहते है। काई यानि हाथ और सूती याानि काॅॅॅटन। दोनों को मिलाकर कसूटी नाम बना अर्थात हाथ और सूत के मेल से बननेवाली सुन्दर कलाकृति। यह दिखने में अत्यंत सरल है परंतु कसूटी कढ़ाई करने में अत्याधिक मेहनत की आवश्यकता पड़ती है। एक एक टांके की गिनती रखनी पड़ती है। कसूटी कढ़ाई में गवंती, मुरगी, नेगी और मेन्थी इन टांकों का प्रयोग होता है। नेगी अर्थात रनिंग स्टिच, गवंती अर्थात डबल रनिंग स्टिच, मुरगी अर्थात झीगझॅग स्टिच और मेन्थी अर्थात क्रॉस स्टिच जो मेथी के दाने की तरह दिखती है। ग्राफ पेपर पर कई तरह के कसूटी के मोटिफ बनायें जा सकते हैं।
बावनबूटी कढ़ाई: यह बिहार के नालंदा की प्रसिद्ध कढ़ाई है। बौद्ध कलाकृतियों के माध्यम से विश्व की सुंदरता को चित्रित किया जाता है। एक सादे वस्त्र पर हाथ से धागे की महीन बूटियाँ डाली जाती हैं। हर कारिगरी में कम से कम बावन बूटियाँ होने के कारण इसे बावनबूटी का नाम दिया है। इस वर्ष 2020 में युनेस्को में सील ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड के लिए भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधित्व करने के लिए नालंदा की बावनबूटी साडी का चयन हुआ है।
इनके अलावा भी कढ़ाई के कई प्रकार अपने भारत देश में प्रचलित है जैसे आंध्र प्रदेश की बंजारा कढ़ाई, कर्नाटक की लंबानी कढ़ाई, मणिपुर की शामिलामी, राजस्थान की दबका और गोटापट्टी, तमिलनाडु की टोडा या पुखूर, उत्तर प्रदेश की मुकैश और बदला इत्यादि। हर कढ़ाई की अपनी विशिष्टता है और अपने चाहने वाले भी हैं जो देश हि नही विदेशों में भी फैले हुए हैं।
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