पारंपरिक भारतीय कढ़ाई के प्रकार भाग - 1

सुई और धागे का उपयोग करके कपड़े को सजाने की कला या हस्तकला को हम कढाई कहते हैं। कढाई की उत्पत्ति क्र्वो मैगनाॅन के दिनों या 30,000 ईसा पूर्व में हो सकती है। इसमें मोती,  मणके, धातु के तार, कपड़े की कतरनें तथा अन्य सामग्री का भी उपयोग किया जा सकता है।

भारतीय संस्कृति की कई विविधताओ के साथ हि कढाई के तरीकों में भी विविधता पाई जाती हैं जो कि प्रत्येक प्रदेश की अपनी विशिष्ट पहचान बन गई है। विभिन्न प्रदेशों के अनुसार पारंपरिक भारतीय कढ़ाई के प्रमुख प्रकार कुछ इसप्रकार हैं।

चिकनकारी: उत्तर प्रदेश के लखनऊ में चिकनकारी का प्रमुख केंद्र है। चिकनकारी की शुुुुरुआत सफेद कपड़े पर सफेद धागे के काम से हुई। आजकल रंग-बिरंगेे कपड़े और धागोंका इस्तेमाल होता है। मसलिन,रेशमी,ऑरगण्डी,शिफाॅॅन,क्रेेप जैसे महीन कपड़ो पर चिकनकारी की जाती है क्योंकि मोटे कपड़ेे पर चिकनकारी का काम उभर कर दिखता नहीं। चिकनकारी कढ़ाई में कई प्रकार के टांके जैसे मुर्री, फंदा, कांटा, तेपची, बखिया, पंखुडी, लौंग, जंजीरा, राहत आदि और कई जालियाँ जैसे बंगला जाली, मुंदराजी जाली, सिद्दोर जाली, बुलबुल चश्म जाली इत्यादि का प्रयोग किया जाता हैं। महिन कपड़े पर बनी हुई चिकनकारी की साडियाँ और कुरते अतिशय लोकप्रिय हैं। 

चिकनकारी कढ़ाई 

फुलकारी: फुलकारी का अर्थ है फूलों की कढ़ाई। फुलकारी कढ़ाई में रंग-बिरंगे रेशम के धागों से तरह तरह की ज्यामितिय आकृतियाँ और फूल पत्तों को बनाया जाता है। फुलकारी खास तौर पर जम्मू और पंजाब में प्रसिद्ध है। यहाँ की लडकियों को बचपन से ही फुलकारी की हस्तकला सिखाई जाती है ताकि उनकी शादी तक कई सारी वस्तुएँ तैयार हो सकें। बाग, थिरमा, दर्शन द्वार और बावन फुलकारी ऐसे फुलकारी के प्रमुख चार प्रकार हैं। बाग फुलकारी में कपड़े को कढ़ाई से इसतरह भर दिया जाता है कि कपड़ा बिलकुल भी ना दिखे। फुलकारी के चुनरी, दुपट्टे और सलवार सूट अतिशय लोकप्रिय है। आजकल पुरूषों के लिए भी फुलकारी किये हुये शर्ट, सूट और कुरते उपलब्ध हैं।

फुलकारी कढ़ाई

जरदोजी: जरदोजी एक फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ है सोने की कढ़ाई। जरदोजी की हस्तकला को मुुगल बादशाह अकबर ने बहुत बढावा दिया। अतः  जरदोजी  कढ़ाई एक बहुत पुरानी और लोकप्रिय कला है। असली सोने और चांदी से जरी बनाकर उससे बेहतरीन रेशमी कपड़े पर कढ़ाई की जाती है इसलिए ये वस्त्र अत्यंत मूल्यवान होते हैं और शादी तथा विशेष समारोहों पर पहने जातें हैं। आजकल सोने-चांदी के स्थान पर नकली तारों का प्रयोग होता है यद्यपि जरदोजी की सुंदरता बरकरार है। आजकल फैशन इंडस्ट्री में जरदोजी की बहुत मांग है

जरदोजी कढ़ाई

काश्मीरी कढ़ाई: काश्मीरी कढ़ाई को कशीदाकारी भी कहा जाता है। इसमें चेन स्टिच और सॅटिन स्टिच का अधिक प्रयोग किया जाता है। फैशन इंडस्ट्री में भी कशीदाकारी की अत्याधिक मांग है। बेडशिटस्, साडियाँ, कुशन कव्हरस्, पर्सेस, ज्वेलरी बाॅक्सेस् आदि पर कशीदाकारी की जाती है। काश्मीरी कढ़ाई के चार प्रकार हैं। अरि,सोजनी,टिल्ला और रेजकार। अरि कढ़ाई कारपेट, तकिया खोल और चादर पर होती है। सोजनी कढ़ाई में बहुत महीन काम होता है जो एकदम बारीक सुई से करते है। पश्मीना और बढ़िया रफ़ल के शाॅल पर सोजनी कढ़ाई होती है। टिल्ला कढ़ाई में गोल्ड और सिल्वर धागों का काम होता है। रेजकार कढ़ाई हल्के शाॅल्स और घरेलू उपयोग के कपड़ो पर की जाती है।

काश्मीरी कढ़ाई 

कांथा कढ़ाई: पारंपरिक रूप से कांथा एक घरेलू कढ़ाई उत्पाद है। ग्रामीण महिलाएं पुरानी साडियाँ और धोती की कई परतें जोड़कर उनपर रनिंग स्टिच यानि बखिया टांके से उत्तम कलाकारी करके पतली रज़ाई बनातीं थी। इसी कला का आधुनिक रूप है कांथा कढ़ाई। आजकल बखिया के साथ साथ रफू स्टिच, चटाई स्टिच, सॅटिन स्टिच, काश्मीरी स्टिच आदि का भी प्रयोग कांथा कढ़ाई में होता है। काॅटन, सिल्क तथा कोसा पर कांथा कढ़ाई की हुई उत्कृष्ट साडियाँ बाजार में उपलब्ध हैं।

कांथा कढ़ाई

टोडा कढ़ाई: तमिलनाडु के नीलगिरी पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले टोडा जनजाति के लोगों की कढ़ाई की शैली को टोडा कढ़ाई कहते है। टोडा कढ़ाई को पुखूर कढ़ाई भी कहते है। पुखूर का अर्थ है फूल। टोडा लोगों का पारंपरिक पोशाक है पुटकुली जो वे खास अवसरों पर पहनते हैं जाते हैं जैसे मंदिर में, त्यौहार पर या मृत्यु होने पर कफ़न के रूप में। पुटकुली को स्त्री और पुरुष दोनों ही एक शाॅल की तरह पहनते हैं। एक मोटे, सफेद,  सूती कपड़े पर लाल और काले (कभी-कभी नीले) धागों से कढ़ाई कर के पट्टे बनायें जाते हैं। टोडा कढ़ाई केवल महिलाऐं करती हैं। टोडा कढ़ाई कीया हुआ कपड़ा बुने हुए कपड़े जैसे दिखता है।

टोडा कढ़ाई 

भारत के विभिन्न प्रांतों की अपनी एक विशेष कढ़ाई की शैली है अतः कढ़ाई यानि कशीदाकारी की यह दुनिया अतिशय विस्तृत है। इस मनमोहक हस्तकला के कुछ और प्रकारों की चर्चा हम करेंगे 'पारंपरिक भारतीय कढ़ाई के प्रकार भाग-2' में। 

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टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर व विस्तृत जानकसरी । इन सुई की कढाईयों से वस्त्रों की खूबसूरती बहुत बढ़ जाती है ।धन्यवाद

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  2. Awesome blog, it gives us spendid types of needle work. Various designs significant for different occasion. Excellent di

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