डाॅ. रखमाबाई राऊत, मूर्तिमंत साहस
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| डाॅ. रखमाबाई राऊत |
कुछ दिनों से यह विषय प्रसार माध्यमोंमें चर्चा में है कि महिलाओं की सहमति आयु अठारह से बढाकर इक्कीस कर देनी चाहिये। एक विचार अनायास ही मन में आया कि अपने भारत में तो बालविवाह की कुप्रथा रही है फिर यह सहमति आयु का मुद्दा किसने उठाया होगा? क्या संघर्ष रहा होगा इसके पीछे? इस बात के मूल में जाने के प्रयास में जो नाम सामने आये उनमें एक नाम मै पहले से जानती थी लेकिन किसी दूसरे संदर्भ में। वह नाम था डाॅ. रखमाबाई राऊत।
प्रथम भारतीय महिला प्रैक्टिसिंग डाॅक्टर
वैसे तो प्रथम भारतीय महिला डाॅक्टर के तौर पर डाॅ. आनंदीबाई जोशी का नाम लिया जाता है परंतु दुर्भाग्यवश डाॅक्टर बनने के बाद जल्द ही उनकी मृत्यु होने के कारण वे प्रैक्टिस नही कर पाई। उनके बाद चिकित्सक बननेवाली डॉ. रखमाबाई राउत, भारत में डॉक्टर के रूप में व्यवसाय करने वाली पहली महिला के रूप में जानी जाती है। गुगल इंडिया ने 1 जुलाई 2018 को डाॅक्टरस् डे डुडल डाॅक्टर रखमाबाई राऊत के सन्मान में प्रदर्शित किया था।
प्रारंभिक जीवन
रखमाबाई की कहानी मुंबई में शुरू होती है जहाँ 22 नवंबर 1864 को पिता जनार्दन सावे और माँ जयंतीबाई के घर उनका जन्म हुआ। केवल आठ वर्ष की आयु में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने सारी संपत्ति रखमाबाई के नाम कर दी. 11 साल की उम्र में, रुखमाबाई की शादी 19 वर्षीय दादाजी भीकाजी राऊत से हुई। उसके बाद, रखमाबाई की माँ का पुनर्विवाह हो गया। रुखमाबाई के सौतेले पिता, डॉ सखाराम अर्जुन, एक सहायक सर्जन थे और वे लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देते थे। रखमाबाई का पती आलसी और आवारा था इसीलिए रुखमाबाई ने उसके साथ नहीं रहने का फैसला किया।
बालविवाह का विरोध
रखमाबाई अपने पति दादाजी के साथ नहीं रहती थी, इसलिए 1884 में उनके पतिने उन्हें ससुराल आने के लिए कोर्ट के जरिए नोटिस भेजा। कोर्ट में रखमाबाई ने तर्क दिया कि विवाह का अर्थ न समझने की आयु में उनका विवाह हुआ है अतः इस विवाह को निभाने के लिए उन्हें मजबूर नही कीया जा सकता। उस जमाने में पति द्वारा पत्नी को छोड़ना एक आम बात थी परंतु रखमाबाई भारत की ऐसी पहिली महिला थी जिसने कानूनन तलाक की मांग की। न्यायाधीश राॅबर्ट हिल पिनहे ने रखमाबाई का तर्क मान्य करते हुए उनके पक्ष में फैसला दिया।
हिंदू समाज द्वारा आलोचना
न्यायाधीश पिनहे के इस फैसले की हिंदू समाज द्वारा प्रखर आलोचना हुई। बाल गंगाधर तिलक ने अपने साप्ताहिक मराठा में लिखा पिनहे को हिंदू समाज की भावनाओं की समझ नहीं है। एक जगह उन्होंने लिखा "महिलाओं को, रखमाबाई, पंडिता रमाबाई को चोरों, व्याभिचारीओं और हत्यारों की तरह दंडित किया जाना चाहिए।" विश्वनाथ नारायण मंडलिक ने उनके एंग्लो मराठी साप्ताहिक 'नेटिव ओपिनीयन' में दादाजी का खुलकर समर्थन किया। 1886 में दादाजी ने न्यायाधीश पिनहे के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
संघर्ष और समझौता
हाईकोर्ट ने हिंदू समाज की भावनाओं का ध्यान रखते हुए न्यायाधीश पिनहे के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने रखमाबाई को दो विकल्प दिए , "या तो आप अपने पति के साथ उसके घर पर रहने जाएं या आप अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर जेल जाएंगे।" इस पर रुखमाबाई ने अदालत को बताया, "अपनी सहमति के बिना हुई शादी में रहने के बजाय मै जेल जाऊँगी।" इस फैसले के खिलाफ मदद के लिए रखमाबाई ने रानी एलिजाबेथ को भी पत्र लिखा था। रखमाबाई ने 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में 'एक हिंदू महिला' के छद्म नाम से इस बारे में लेख भी लिखे थे हालाकि इस बात को उन्होंने कभी खुले तौर पर नही स्वीकारा। 1884 में शुरू हुए इस मुकदमे का अंत समझौते में हुआ। दो हजार रुपये की राशि ले कर दादाजी ने रखमाबाई को मुक्त किया।
अध्ययन
बंधमुक्त होते हि रखमाबाई ने डाॅक्टर बनने के लिए लंडन प्रस्थान किया।कामा अस्पताल के डाॅ. एडिथ पेचे ने उन्हें प्रोत्साहित किया और आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए मदद भी की। रखमाबाई ने लंडन स्कूल ऑफ मेडिसिन से डाॅक्टरी की डिग्री प्राप्त की। वे एम डी करना चाहती थी परंतु लंडन स्कूल ऑफ मेडिसिन में महिलाओं को एम डी करने की अनुमति नहीं थी अतः ब्रुसेल्स जा कर उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसतरह रखमाबाई एम डी करने वाली प्रथम भारतीय महिला बनी।
चिकित्सकीय और सामाजिक कार्य
भारत लौट कर रखमाबाई ने सूरत और राजकोट के अस्पतालों में चिकित्सक के तौर पर काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद रखमाबाई ने मुंबई में स्थायीक हो कर डाॅक्टरी कि प्रैक्टिस की। साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य एवं शिक्षण के क्षेत्र में उनका सामाजिक कार्य उल्लेखनीय है। मुंबई में ही, 91 की आयु में 25 सितंबर 1955 को उनका निधन हुआ। अपने अंतिम समय तक रखमाबाई ने बालविवाह तथा परदा प्रथा के विरोध में पुरज़ोर कोशिश की।
न्यूनतम सहमति आयु कानून
हालांकि रखमाबाई राऊत के मुकदमे का अंत समझौते में हुआ परंतु इस मुकदमे की वजह से पहली बार शादी के समय लड़की की उम्र, उसकी पसंद, उसकी सहमति आदि मुद्दों पर चर्चा हुई और इस चर्चा ने समाज सुधारकों को बालविवाह जैसी कुप्रथा के उच्चाटन के लिए प्रयास करने को प्रेरित किया। महाराष्ट्र में रमाबाई रानडे, बेहरामजी मलबारी, पंडिता रमाबाई आदि सुधारकों द्वारा महत्प्रयासों के कारण 1891 में महिलाओं के लिए न्यूनतम सहमति आयु कानून लागू किया गया जिसमें सहमति आयु 12 वर्ष थी। समय-समय पर इस कानून में परिवर्तन करके सहमति आयु को बढाया गया।
जिस युग में भारतीय महिलाओं को पुरुषों के सामने नज़र उठाने की भी अनुमति नही थी, उस समय रखमाबाई द्वारा उठाया गये इस साहसपूर्ण कदम ने सभी भारतीय महिलाओं के भविष्य को बदल दिया। आज 22 नवंबर, रखमाबाई का जन्मदिवस। डाॅ. रखमाबाई राऊत के साहस, दृढनिश्चय, आत्मविश्वास और कार्यक्षमता को सादर वंदन।
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Yes indeed an eye opener blog. Today because of this blog I could get to know about this great woman. On her birth anniversary, it's a great tribute to remember her.I salute Dr Rakhmabai Raut.
जवाब देंहटाएंHumble tribute to the memories of Dr Rakhmabai Raut and thanks to you for exploring such great personality.
जवाब देंहटाएंबहुत स्पष्ट व विस्तृत जानकारी मिली ।अच्छा लिखा आपने..👌
जवाब देंहटाएंया लेखमुळे रखमाबाई राऊत यांचे जीवनचरित्र व कार्य याची माहिती साध्या सरळ भाषेत मिळाली रख्माबाई च्या कार्याला प्रणाम
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